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सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय(1911-1987 ई.)

हिंदी में प्रयोगवाद के प्रवर्त्तक अज्ञेय का जन्म उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले के कसया ग्राम में हुआ। शिक्षा मद्रास तथा लाहौर में हुई। स्वतंत्रता आंदोलन तथा किसान आंदोलन में भाग लिया तथा 'सैनिक, 'विशाल भारत, 'बिजली, 'प्रतीक, 'दिनमान आदि का संपादन किया। अज्ञेय ने हिंदी साहित्य की बहुआयामी सेवा की। इनके मुख्य काव्य संग्रह हैं- 'भग्न दूत, 'इत्यलम्, 'हरी घास पर क्षण भर, 'अरी ओ करुणा प्रभामय, 'आंगन के पार द्वार, 'पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ, 'महाबृक्ष के नीचे, 'नदी की बांक पर छाया, 'सुनहले शैवाल तथा 'ऐसा कोई घर आपने देखा है आदि। कविता के क्षेत्र में इन्होंने अनेक नए-नए प्रयोग किए। अज्ञेय की संपूर्ण कविताएं दो खंडों में 'सदानीरा नाम से प्रकाशित हैं। इसके अतिरिक्त 'शेखर : एक जीवनी (उपन्यास), कहानी, भ्रमण वृत्तांत, आलोचना, निबंध, एकांकी आदि प्राय: सभी विधाओं में रचना की। आधुनिक कवियों के तारसप्तक, दूसरे, तीसरे तथा चौथे सप्तक का संपादन किया। अज्ञेय भारतीय ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी तथा भारत-भारती पुस्तक से सम्मानित हुए।


जैसा तुझे स्वीकार हो

जैसे तुझे स्वीकार हो!
डोलती डाली, प्रकम्पित पात, पाटल स्तंभ विलुलित
खिल गया है सुमन मृदु-दल, बिखरते किंजल्क प्रमुदित,
स्नात मधु से अंग रंजित-राग केशर-अंजली से
स्तब्ध सौरभ है निवेदित,
मलय-मारुत और अब जैसे तुझे स्वीकार हो।
पंख कम्पन-शिथिल, ग्रीवा उठी, डगमग पैर,
तन्मय दीठ अपलक-
कौन ॠतु है, राशि क्या है, कौन-सा नक्षत्र, गत-शंका,
द्विधा-हत,
बिंदु अथवा वज्र हो-
चंचु खोले आत्म-विस्मृत हो गया है यती चातक-
स्वाति, नीरद, नील-द्युति,जैसे तुझे स्वीकार हो।
अभ्र लख भ्रू-चाप-सा, नीचे प्रतीक्षा में स्तिमित नि:शब्द
धरा पांवर-सी बिछी है, वक्ष उद्वेलित हुआ है स्तब्ध,
चरण की ही चाप, किंवा छाप तेरे तरल चुम्बन की-
महाबल हे इंद्र, अब जैसे तुझे स्वीकार हो।
मैं खडा खोले हृदय के सभी ममता द्वार,
नमित मेरा भाल, आत्मा नमित-तर, है नमित-तम
मम भावना संसार,
फूट निकला है न जाने कौन हृत्तल बेधता-सा,
निवेदन का अतल पारावार,
अभय-कर हो, वरद कर हो, तिरस्कारी वर्जना, हो प्यार
तुझे, प्राणाधार, जैसे हो तुझे स्वीकार-
सखे, चिन्मय देवता, जैसे तुझे स्वीकार हो!
अपना गान
इसी में ऊषा का अनुराग,
इसी में भरी दिवस की श्रांति,
इसी में रवि की सांध्य मयूख
इसी में रजनी की उद्भ्रांति;
आर्द्र से तारों की कंपकंपी,
व्योम गंगा का शांत प्रवाह,
इसी में मेघों की गर्जना,
इसी में तरलित विद्युद्दाह;
कुसुम का रस परिपूरित हृदय,
मधुप का लोलुपतामय स्पर्श
इसी में कांटों का काठिन्य
इसी में स्फुट कलियों का हर्ष
इसी में बिखरा स्वर्ण पराग,
इसी में सुरभित मंद बतास,
ऊम्ममाला का पागल नृत्य,
ओस की बूंदों का उल्लास;
विरहिणी चकवी की क्रंदना,
परभृता-भाषित-कोमल तान,
इसी में अवहेला की टीस,
इसी में प्रिय का प्रिय आह्वान;
भारी आंखों की करुणा भीख
रिक्त हाथों से अंजलि-दान,
पूर्ण में सूने की अनुभूति-
शून्य में स्वप्नों का निर्माण;
इसी में तेरा क्रूर प्रहार,
इसी में स्नेह-सुधा का दान-
कं इसको जीवन इतिहास
या कं केवल अपना गान?


प्रतीक्षा

नया ऊगा चांद बारस का,
लजीली चांदनी लंबी,
थकी संकरी सूखती दीर्घा :
चांदनी में धूल-धवला बिछी लंबी राह।
तीन लंबे ताल, जिन के पार के लंबे कुहासे को
चीरता, ज्यों वेदना का तीर, लंबी टटीरी की आह।
उमडती लंबी शिखा सी, यती-सी धूनी रमाये
जागती है युगावधि से संची लंबी चाह-
और जाने कौन-सी निर्व्यास दूरी लीलने दौडी
स्वयं मेरी निलज लंबी छांह!

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय(1911-1987 ई.)
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