श्री चित्रगुप्तजी (कायस्थ) का वर्ण निर्णय

श्री चित्रगुप्तजी (कायस्थ) का वर्ण निर्णय

सर्वत्र यह सुनने को मिलता है कि ब्रह्मा ने चार वर्णो ब्राह्मण्, क्षत्रिय , वैश्य तथा शुद्र कि रचना कि तत्पश्चात चित्रगुप्त क अविर्भाव हुआ। तब तो कायस्थ का पन्चम वर्ण होना चाहिये। किन्तु मनु स्मृति, हारित स्मृति, मिताक्षरा, शुक्रनिति, गरुऱ पुराण , स्कन्द पुराण्, पद्मपुरन आदि किसी भी शास्त्र से पन्चम वर्ण का प्रमाण नही मिलता है । अत: चित्रगुप्तज को उक्त चार वर्णो के अन्तर्गत ही होना चाहिये । कुछ लोगो का कह्ना है कि जब चार वर्णो के बाद कायस्थ का आविर्भाव हूआ तो उसे शुद्र के अन्तर्गत ही आना चाहिये । दूसरी बात यह है की मन्वादि धर्मशास्त्र में चित्रगुप्त या कायस्थ जाति का तत्व निर्नित नही हूआ  है । किसी-किसी स्मृति शास्त्र में चित्रगुप्त और कायस्थ का नाम पाया जाता है। परन्तु इससे यह नही समझा जा सकता है कि कायस्थ कौन वर्ण है?

 अब हम इस विषय पर कुछ प्रमाण् प्रस्तुत करना चाहते है जिससे चित्रगुप्तज (कायस्थ) का वर्ण ज्ञात हो सकता है ।

विष्णुपुराण , याज्ञवल्क्य पुराण , वृहत पुराण आदि ख्यात शास्त्रो से यह प्रमाणित होता है कि चित्रगुप्त यमराज के लेखक थे। क़ायस्थ का पर्यायवाची लेखक या राजाज्ञा का लेखक माना गया है। पहले हिन्दु राजसभा में लिखने के काम में कायस्थ के सिवा दुसरे को नही रखा जाता था। इसलिये कायस्थ या राजसभा के लेखक राजा का साधनांग समझे जाते थे। मनु सन्हिता के 8वे श्लोक के भाव में मेंधातिथि ने लिखा है , जिसका अर्थ इस प्रकार है राज दत्त ब्रह्मोत्तर भुमि आदि का शासन्, जो एक कायस्थ के हाथ का लिखा हुआ है:- 

                      सन्धि-विग्रह्कारी तु भवेध्यतस्य लेखक:।

                      स्वयं राजा समादिष्ट: स लिखेद्राज शासनम।

 

अर्थात जो राजा का सन्धि - विग्रह्कारि लेखक होगा, वही राजा के आदेशानुसार राज शासन लिखेगा।

मनु सन्हिता (6154,56) के अनुसार-सुप्रतिष्ठित, वेदादि धर्मशास्त्रों में पारदर्शी, शूर और युद्धविद्या में निपुण और कुलीन ऐसे सात - आठ् मंत्री प्रत्येक राजा के पास रहने चाहिए। ऱाजाओ को सन्धि-विग्रह कि सलाह उन्हि बुद्धिमान सचिवों से लेनी चाहिये।

    'मिताक्षरा' में विध्नानेश्वर ने लिखा है, जिसके अनुसार राजा के सात् - आठ् मंत्री रहते थे, वे सभी ब्राहमण् नही थे। क्योकि उसके बाद ब्राहमण् से क्या-क्या विचार लेंगे यह भी लिखा है। यहि भाव याज्ञवल्क्य पुराण के प्रथम अध्याय के 112वें श्लोक का भी है।

शुक्रनीति में स्पष्ट लिखा है :-

    पुरोधाच प्रतिनिधि: प्रधानस्सचिवस्तथा।69।

    मंत्री च प्राङ्विवाकश्च् पण्डितश्च सुमन्त्रक:।

    अमात्यो दुत एत्येता राज्ञो प्रकृतयो दश ॥70॥

    दश प्रोक्ता पुरोद्याद्या ब्राहमण सर्व एव ते।

    आभावे क्षत्रिय: योज्यास्तदभावे तयोरुजा॥418॥

    नैव शुद्रास्तु सन्योज्या गुण्वन्तोअपि पार्थिवे:।

(द्वितीय अध्याय्)

अर्थात्- पुरोहित्, प्रतिनिधि, प्रधान सचिव्, मंत्री प्राड्विवाक , पंडित, सुमन्त्र, अमात्य और दूत -ये दशव्यक्ति राजा की प्रकृति है। उक्त पुरोहित आदि दशो लोग ब्राहमण होने चाहिये, ब्राहमन के आभाव में क्षत्रिय , क्षत्रिय  के आभव में वैश्य भी नियुक्त हो सकते है । शुद्र गुण्वान होने पर भी राजा उक्त कार्यो के लिये उसे नियुक्त न कर सकेंगे।

 

 शुक्रनिति में सन्धि-विग्रहीक को ‘सचिव'नाम से उल्लेख किया गया है।यह सन्धि विग्रहक शुद्र नहीं हो सकते यह बात भी शुक्रनिति में स्पष्ट लिखा है। हारित स्मृति (द्वीतिय अध्याय्) में भी यही बात स्पष्ट रुप से लिखी गयी है।

 

शुक्रनिति (2-266-67) में लिखा है -

शास्त्रो दूरं  नृपातिश्ठेदस्त्रपाताद्वहि: सदा॥

सशस्त्रोदश हस्तन तु यथादिश्ट्न नृपप्रिया।

पन्चहस्तन वसैयुर्वे मंत्रीण्: लेखका सदा ॥

 

अर्थात राजाओ को आग्नेयास्त्र से और जहाँ अस्त्र गिरते हो- ऐसे स्थानो से सदा दुर रहना चाहिये। राजा से दश हाथ कि दुरी पर उनके प्रिय शस्त्र धारि, पांच हाथ कि दुरि  पर एक मंत्री और उनके पास बगल में एक लेखक रहेंगे|

 

शुक्रनिति (4/557-58) के अनुसार् राजा, अध्यक्ष्, सभ्य स्मृति, गणक़् , लेखक हेम्, अग्नि, जल्, और सत्पुरुष - ये सधानांग है । उपयुक्त प्रमाण से यह सिद्ध हो जाता है कि जो लेखक राजा के ब्राहमण मंत्री के पास बैठते थे और जो राजा के अंग गिने जाते थे वे कदपि शुद्र नहि हो सकते थे।

 

अंगीरा स्मृति के अनुसार ब्राह्मणों को शुद्र के साथ बैठना निषिद्ध था । इस स्थिति में हिन्दु राज सभा में ब्रह्मण मंत्री के पास जो लेखक या कायस्थ बैठते थे , वे द्विज जाति के अवश्य होने चाहिए।

शुक्र निति (2/420) में स्पष्ट लिखा है :- 

 

ग्रामपो ब्राहमनो योग्य: कायस्थो लेखकस्तथा।

शुल्कग्राहि तु वैश्योहि प्रतिहारश्च पादज्:॥

 

इससे साफ ज्ञात होता है कि लेखक कायस्थ ब्राहमण नही, वैश्य नही, तथा शुद्र भी नही होते थे। और जब चार ही वर्ण् माने जाते है, तब कायस्थ निश्चय ही क्षत्रिय  है।कायस्थ क्षत्रिय  वर्ण हैँ, इनके अनेक प्रमाण हैँ। फिर भी कुछ प्रमाण और प्रस्तुत करता हुँ।

 

पदम् पुराण (उत्तर खन्द्) के अनुसार :- ब्रहमा जी ने चित्रगुप्त जी से कहा:- 

    क्षात्रवर्णोचितो धर्म: पालनियो यथाविधि।

    प्रजाँ सृजस्व भो पुत्र भूमिभार समाहितम॥

 

अर्थात तुम वहाँ क्षत्रिय  धर्म का पालन करना और पृथ्वी में बलिष्ठ प्रजा उत्पन्न करना।

 

कमलाकरभट्ट क्रित वृहत्ब्रहम्खण्ड् में लिखा है-

    भवान क्षत्रिय वर्णश्च समस्थान समुद्भवात्।

    कायस्थ्: क्षत्रिय: ख्यातो भवान भुवि विराजते॥

 

व्येवेस्था दर्पण् श्यामच्ररन् सरकार के द्वारा तीसरा प्रकाशन खंड 1 पृष्ठ 684 के अनुसार ब्रह्मा ने चित्रगुप्त वंश की वृद्धि देखकर एक दिन आन्न्दपुर्वक कहा - हमने अपने बाहू से मृत्युलोक में अधिश्वर रुप में क्षत्रिय  कि सृष्टि की है । हमारी यह इक्षा है कि तुम्हारे पुत्र भी क्षत्रिय  होँ। उस समय चित्रगुप्त बोल उठे :- अधिकाँश राजा नरकगामी होँगे। हुम नहि चाहते कि हमारे पुत्रोँ में अद्रिश्ट में भी यह दुर्घटना आ पऱे। हमारी प्रार्थना है कि आप उनके लिये कोइ दुसरी व्यवस्था कर दिजिए। ब्रह्मा जी ने हंसकर उत्तर दिया अच्छा आपके पुत्र 'असि' के बदले 'लेखनी' धारण करेँगे।

 

यह बात युक्त प्रदेश के पातालखण्ड में भी मिलती है।

 

ज़ब संस्कृत महाविद्यालय में कायस्थ छात्र लिये जायेँगे या नही बात उठी, उस समय संस्कृत महाविद्यलय के अध्यक्ष रुप स्वर्गिय ईश्वरचन्द्र विद्यसागर महशय ने शिक्षा विभाग के अध्यक्ष महोदय 1851 ई. की 20वीँ मार्च को लिखा था :- जब शुद्र जाति संस्कृत महविद्यालय में पढ सकते हैँ तब सामान्य कायस्थ क्योँ नहि पढ् सकेँगे| उसी प्रकार  उनके परवर्ती संस्कृत महाविद्यालय के अध्यक्ष स्वर्गिय महामहोपाध्याय महेश्वरचंद्र न्यायरत्न महाशय ने तत्कलीन संस्कृत महविद्यालय के स्मृति अध्यापक स्वर्गिय मधुसुदन स्मृतिरत्न महोदय को कहा था - कायस्थ जाति क्षत्रिय वर्ण है , यह हम अच्छी तरह समझ सकते है ।उनके परवर्ती अध्यक्ष् महामहोपाध्याय नीलमणी न्यायालँकार महाशय ने कायस्थोँ को क्षत्रिय  की भाँती स्वीकार किया है।

 

( इनके द्वारा लिखित बँगला इतिहास् द्रष्ट्व्य)

 

इसी प्रकार अनेक प्रमाण हैँ जिससे यह प्रमाणित होता है की कायस्थ क्षत्रिय वर्ण के अन्तर्गत हैँ ।

 

इनके अतिरिक्त अनेक कायस्थ राजा भी हुए हैँ इनका भी प्रमाण प्रचुर मात्रा में है। आइने अकबरी के अनुसार दिल्ली में डेढ सौ वर्ष से अधिक कायस्थ क शासन रहा। आवध में 16 पुस्तो तक कायस्थ ने शासन किया। बँगाल के राजा तानसेन ने आम्बश्ठ्वन्शीय कायस्थ थे। बँगाल में गौऱवन्शीयोँ का शासन सर्वविदित है।

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