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    कायस्थ - धर्मराज चित्रगुप्त के वंसज
    वर्ण -       द्विज -क्षत्रिय 
    जति -      राजन्य कायस्थ
    उपनाम -  धर्मराजपुत्र

    विष्णुपुराण , याज्ञवल्क्य पुराण , वृहत पुराण आदि ख्यात शास्त्रो में यह प्रमाणित किया गया है कि महाराज चित्रगुप्त यमराज के लेखक थे। और कालांतर कायस्थ शब्द का अर्थ विद्वानो द्वारा लेखक बताया गया जो कि पूर्णतया गलत है वैसे ही जैसे इन विद्वानो ने वेदो में लिखे तैतीस कोटी का अर्थ तैतीस करोड़ बता दिया जबकि कोटि का अर्थ प्रकार से है । ब्राहमणो द्वारा लेखन अशुद्ध किये जाने के कारण स्वयं क्षत्रिय अपने जरुरत के हिसाब से लिखने लगे या उक्त कार्य के लिए क्षत्रियो को ही नियुक्त किया जाने लगा।

    कायस्थ से ईर्ष्या होने के कारण ब्राहमणो ने कई बार कायस्थों को शुद्र शाबित करने कि कोसिस की और जब नहीं कर सके तो उनके ग्रंथो में लिख दिया जिनका अनुकरण उनकी पीढ़ियां करने लगी । ऐसी कुछ घटनाओ का वर्णन करता हूँ ।

    जब स्वामी विवेकानंद को विश्व धर्मं सभा में सम्मिलित होने शिकागो जाना था तब बंगाल के ब्राह्मण इनके विरोध में आ गये और कह दिया ये कायस्थ हैं कायस्थ शुद्र होते हैं इसको धर्म सभा में जाने का अधिकार नहीं । इस घटना पर स्वामी ने उन सबको उत्तर दिया जो इस प्रकार है :-

    स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था -

    "समाज सुधारकों की पत्रिका में मैंने देखा कि मूझे शूद्र बताया गया है और चुनौती दी गई है कि शूद्र संन्यासी कैसे हो सकता है। इस पर मेरा जवाब है : मैं अपना मूल वहां देखता हूं जिसके चरणों में हर ब्राह्मण ये कहते हुए वंदना करता है और पुष्प अर्पित करता है - यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नम:। और जिनके पूर्वपुरुष क्षत्रीय में भी सबसे पवित्र गिने जाते हैं। अगर आप अपने धर्मग्रंथों और पुराणों पर विश्वास रखते हैं तो उन तथाकथित सुधारकों को ये मालूम होना चाहिए कि अतीत में दूसरे योगदान के अलावा मेरी जाति ने कई सदियों तक लगभग आधे भारत पर शासन किया है। अगर मेरी जाति की बात छोड़ दी जाए तो वर्तमान भारतीय सभ्यता में क्या शेष रह जाएगा। सिर्फ बंगाल में ही मेरी जाति ने सबसे महान दर्शनशास्त्री, सबसे महान कवि, सबसे महान इतिहासकार, सबसे महान पुरातत्ववेत्ता, सबसे महान धर्मप्रचारक दिए हैं। हमारी जाति से भारत के सबसे महान आधुनिक वैज्ञानिक पैदा हुए हैं। इन विरोधियों को इतिहास का ज्ञान होना चाहिए और जानना चाहिए कि ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य इन तीनों जातियों को संन्यासी बनने का समान अधिकार है। उन्हें वेद पाठ करने का भी समान अधिकार है। वैसे ये तो एक बात है। यदि वो मुझे शूद्र कहते हैं तो भी मुझे कोई कष्ट नहीं है।"

    (one word more: I read in the organ of the social reformers that I am called a Shudra and am challenged as to what right a Shudra has to become a Sannyasin. To which I reply: I trace my descent to one at whose feet every Brahmin lays flowers when he utters the words — — and whose descendants are the purest of Kshatriyas. If you believe in your mythology or your Paurânika scriptures, let these so-called reformers know that my caste, apart from other services in the past, ruled half of India for centuries. If my caste is left out of consideration, what will there be left of the present-day civilisation of India? In Bengal alone, my blood has furnished them with their greatest philosopher, the greatest poet, the greatest historian, the greatest archaeologist, the greatest religious preacher; my blood has furnished India with the greatest of her modern scientists. These detractors ought to have known a little of our own history, and to have studied our three castes, and learnt that the Brahmin, the Kshatriya, and the Vaishya have equal right to be Sannyasins: the Traivarnikas have equal right to the Vedas. This is only by the way. I just refer to this, but I am not at all hurt if they call me a Shudra.)

    ऐसी स्थिति शिवाजी महाराज के समय में भी हुई थी लेखक मस्त राम कपूर ने उनकी लिखी पुस्तक " नैतिकता लोकतंत्र  कि तलास " पुस्तक में लिखते हैं कि 50,000 ब्रह्मणो को चार महीने तक भोजन और स्वर्ण - मुद्राओ से परिपूर्ण करने के बाद(जिसका खर्च उस समय के लगभग 7 करोड़ बताया गया है ) भी  उनके ब्राह्मण मंत्री उनको शुद्र मानते रहे और इस बात से क्षुब्द होकर शिवाजी बालाजी आवजी जो कायस्थ थे उन पर अधिक निर्भर हो गये । ब्राहमणो ने प्रभु कायस्थ मंत्रियो से होड़ किया और ब्राहमणो ने उन्हें शुद्र घोषित कर दिया ।


    अब आईये देखते हैं इन ब्राहमणो के पूर्वजो ने ग्रंथो में क्या लिखा था : -

     ॥ ॐ यमाय धर्मराजाय श्री चित्रगुप्ताय वै नमः ॥

    गरुड़ पुराण में कहा गया है कि चित्रगुप्त का राज्य सिंहासन यमपुरी में है और वो अपने न्यायालय में मनुष्यों के
    कर्मों के अनुसार उनका न्याय करते हैं तथा उनके कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं, जो कि निम्नवत स्पष्ट हैं :-

    " धर्मराज चित्रगुप्त: श्रवणों भास्करादय: कायस्थ तत्र पश्यनित पाप पुण्यं च सर्वश:          |
    "चित्रगुप्तम, प्रणम्यादावात्मानं सर्वदेहीनाम। कायस्थ जन्म यथाथ्र्यान्वेष्णे नोच्यते मया।।"

    (सब देहधारियों में आत्मा के रूप में विधमान चित्रगुप्त को प्रमाण। कायस्थ का जन्म यर्थाथ के अन्वेषण (सत्य कि खोज ) हेतु ही हुआ है।
     
    यजुर्वेद आपस्तम्ब शाखा चतुर्थ खंड यम विचार प्रकरण से ज्ञात होता है कि महाराज चित्रगुप्त के वंसज चित्ररथ ( चैत्ररथ ) जो चित्रकुट के महाराजाधिराज थे और गौतम ऋषि के शिष्य थे ।

    बहौश्य क्षत्रिय जाता कायस्थ अगतितवे। चित्रगुप्त: सिथति: स्वर्गे चित्रोहिभूमण्डले।।
    चैत्ररथ: सुतस्तस्य यशस्वी कुल दीपक:। ऋषि वंशे समुदगतो गौतमो नाम सतम:।।
    तस्य शिष्यो महाप्रशिचत्रकूटा चलाधिप:।।

    “प्राचीन काल में क्षत्रियों में कायस्थ इस जगत में हुये उनके पूर्वज चित्रगुप्त स्वर्ग में निवास करते हैं तथा उनके
    पुत्र चित्र इस भूमण्डल में सिथत है उसका पुत्र (वंसज ) चैत्रस्थ अत्यन्त यशस्वी और कुलदीपक है जो ऋषि-वंश
    के महान ऋषि गौतम का शिष्य है वह अत्यन्त महाज्ञानी परम प्रतापी चित्रकूट का राजा है।”

    विष्णु धर्म सूत्र (विष्णु स्मृति ग्रंथ के प्रथम परिहास के प्रथम श्लोक में तो कायस्थ को परमेश्वर का रुप कहा गया है।

      "येनेदम स्वैच्छया, सर्वम, माययाम्मोहितम जगत। स जयत्यजित: श्रीमान कायस्थ: परमेश्वर:।।"

    यमांश्चैके-यमायधर्मराजाय मृतयवे चान्तकाय च।
    वैवस्वताय, कालाय, सर्वभूत क्षयाय च।।
    औदुम्बराय, दघ्नाय नीलाय परमेषिठने।
    वृकोदराय, चित्रायत्र चित्रगुप्ताय त नम:।।
    एकैकस्य-त्रीसित्रजन दधज्जला´जलीन।
    यावज्जन्मकृतम पापम, तत्क्षणा देव नश्यति।।

    यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतों का क्षय करने वाले, औदुम्बर, चित्र, चित्रगुप्त, एकमेव, आजन्म
    किये पापों को तत्क्षण नष्ट कर सकने में सक्षम, नील वर्ण आदि विशेषण चित्रगुप्त के परमप्रतापी स्वरूप का बखान करते
    हैं। पुणयात्मों के लिए वे कल्याणकारी और पापियों के लिए कालस्वरूप है।

    कमलाकरभट्ट क्रित वृहत्ब्रहम्खण्ड् में लिखा है-

    भवान क्षत्रिय वर्णश्च समस्थान समुद्भवात्। कायस्थ्: क्षत्रिय: ख्यातो भवान भुवि विराजते॥

    स्कंद पुराण में कायस्थ के सात लक्षणों को बताया गया है ।

    " विद्या वाश्च्य शुचि; धीरो , दाता परोप्कराकः ! राज्य सेवी , क्षमाशील; कायस्थ सप्त लक्षणा ; !!

    ज़ब संस्कृत महाविद्यालय में कायस्थ छात्र लिये जायेँगे या नही बात उठी, उस समय संस्कृत महाविद्यलय के अध्यक्ष रुप स्वर्गिय ईश्वरचन्द्र विद्यसागर महशय ने शिक्षा विभाग के अध्यक्ष महोदय 1851 ई. की 20वीँ मार्च को लिखा था :- जब शुद्र जाति संस्कृत महविद्यालय में पढ सकते हैँ तब सामान्य कायस्थ क्योँ नहि पढ् सकेँगे| उसी प्रकार  उनके परवर्ती संस्कृत महाविद्यालय के अध्यक्ष स्वर्गिय महामहोपाध्याय महेश्वरचंद्र न्यायरत्न महाशय ने तत्कलीन संस्कृत महविद्यालय के स्मृति अध्यापक स्वर्गिय मधुसुदन स्मृतिरत्न महोदय को कहा था - कायस्थ जाति क्षत्रिय वर्ण है , यह हम अच्छी तरह समझ सकते है ।उनके परवर्ती अध्यक्ष् महामहोपाध्याय नीलमणी न्यायालँकार महाशय ने कायस्थोँ को क्षत्रिय  की भाँती स्वीकार किया है।

    ( इनके द्वारा लिखित बँगला इतिहास् द्रष्ट्व्य)

    इसी प्रकार अनेक प्रमाण हैँ जिससे यह प्रमाणित होता है की कायस्थ क्षत्रिय वर्ण के अन्तर्गत हैँ ।

    इनके अतिरिक्त अनेक कायस्थ राजा भी हुए हैँ इनका भी प्रमाण प्रचुर मात्रा में है। आइने अकबरी के अनुसार दिल्ली में डेढ सौ वर्ष से अधिक कायस्थ क शासन रहा। आवध में 16 पुस्तो तक कायस्थ ने शासन किया। बँगाल के राजा तानसेन आम्बश्ठ्वन्शीय कायस्थ थे। बँगाल में गौऱवन्शीयोँ का शासन सर्वविदित है।

    Contents Sources @ https://kayasthsangh.weebly.com

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