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कई रोगों में कारगर हैं यह कहीं भी उग जाने वाले पौधे


हेल्थ डेस्क. आपको अपने आसपास, सड़क के किनारे, बगीचे में या फिर किसी बेकार पड़ी जमीन पर कई पौधे उगे हुए मिलेंगे। जाने-अनजाने हम उन्हें नष्ट कर देते हैं। लेकिन इनमें से कई पेड़-पौधे कीमती जड़ी-बूटियां हैं। हम इन्हें पहचानकर और सहेजकर इनकी मदद से कई समस्याओं और रोगों को खत्म कर सकते हैं।

आयुर्वेद चिकित्सक और लेखक डॉ. अबरार मुल्तानी बता रहे हैं ऐसे ही 4 पौधों के बारे में...

  1. बिच्छू काट लेने पर दंश स्थान पर इसकी पत्तियों का रस लगाकर इसकी जड़ को घिसने से कुछ ही सेकंड में आराम मिल जाता है। अस्थमा में इसकी जड़ का चूर्ण सुबह खाली पेट लेने से फायदा होता है। जड़ का चूर्ण या काढ़ा पथरी के लिए भी सटीक दवाई है। इसकी पत्तियों का चूर्ण मोटापे में बहुत लाभदायक है, विशेष रूप से महिलाओं में। इसके बीज माहवारी और खूनी बवासीर में फायदेमंद हैं।

  2. धतूरा वह अमृत है जिसे हम ज़हर समझकर नज़रंदाज़ कर देते हैं या डर जाते हैं। लेकिन यह कई समस्याओं के समाधान में कारगर है। इसके पूरे पौधे को लेकर उसे सरसों के तेल में पका लें और उस तेल से जोड़ों की मालिश करने से जोड़ों का दर्द कम होता है। इसकी पत्तियों को पानी में उबालकर उस पानी से सिर धोने से जुएं नही पड़तीं। यह पानी सूजन वाले स्थान पर लगाने पर राहत मिलती है।

  3. अर्क या अकव्वा/आंकड़ा की जड़ ट्यूमर, सिस्ट और सभी घावों में लाभ पहुंचाती है। इसके पत्तों को गरम करके एड़ी पर बांधने से एड़ियों का दर्द ठीक हो जाता है। इसके पत्तों से निकलने वाले दूध को चुभे हुए कांटे या अन्य कोई वस्तु जैसे कांच आदि पर लगाने से वह स्वतः बाहर निकल आती है। इसके फूल की पंखुड़ियों को निकालकर बचे हुए भाग को पान में रखकर चूसने से पीलिया में आराम मिलता है।

  4. अरण्डी के पौधे के सभी हिस्से विशेष औषधि महत्व के हैं। इसकी नई और कोमल लालिमायुक्त पत्तियों का आधा से एक चम्मच रस दूध में मिलाकर लेने से पीलिया में बहुत लाभ होता है। इसकी जड़ का काढ़ा बनाकर लेने से पथरी में फायदा होता है। इसके बीजों से निकलने वाला तेल कब्ज और आंतों से संबंधित रोगों को ठीक करता है। जोड़ों के दर्द में भी यह तेल बहुत लाभदायक है।



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      4 plants and their medicinal value

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सेहत के लिए अच्छा है अलग-अलग तेल का इस्तेमाल करना


लाइफस्टाइल डेस्क. तेलभारतीय भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके बगैर भोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन इन दिनों जब भी सेहत की बात आती है तो तेल की चर्चा जरूर उठती है। यह सवाल भी अक्सर उठता है कि हमें कौन-सा तेल खाना चाहिए? यानी कौन-सा तेल अच्छा है और कौन-सा खराब? कितना खाना चाहिए? तेल से जुड़े ऐसे ही और भी कई सवालों के जवाब दे रहींहैं डाइट एवं वेलनेस एक्सपर्ट डॉ. शिखा शर्मा...


सबसे पहले तो बात करते हैं कि कौन-सा तेल अच्छा है और कौन-सा खराब? इसका सबसे आसान जवाब है- कोई भी तेल अच्छा या बुरा नहीं है। दरअसल, कोई भी तेल अपने आपमें पूरा नहीं है। इसलिए हमें केवल एक ही तेल लगातार नहीं खाना चाहिए। कुछ अरसा पहले नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ न्यूट्रीशन हैदराबाद ने अपनी एक रिसर्च में भी इस बात की अनुशंसा की थी कि हमें हर तीन माह में अपना तेल बदल देना चाहिए।

मैं तो कहूंगी कि हमें तीन माह में ही नहीं, बल्कि लगातार तेल बदलते रहना चाहिए। एक बोतल तेल खत्म होते ही हमें दूसरी तरह का तेल इस्तेमाल करना चाहिए। बल्कि इससे भी बेहतर तो यह होगा कि हमें अपने किचन में कम से कम दो तरह के तेल एक साथ रखने चाहिए। और उन्हें बदल-बदलकर इस्तेमाल करने चाहिए। मसलन, सब्जी सरसों के तेल में बनाएं तो दाल सनफ्लावर के तेल में (या जो भी पसंद हो)।

क्यों बार-बार बदलें तेल?

हर कुकिंग ऑयल अपने आप में विशिष्ट होता है। तेल में तीन तरह के फैट पाए जाते हैं - पॉलीअनसैचुरेटेड फैट (PUFA), मोनोअनसैचुरेटेड फैट (MUFA) और सैचुरेटेड फैट। किसी तेल में कोई ज्यादा रहता है तो किसी तेल में कोई कम। तीनों ही फैट की एक निश्चित मात्रा हमारे शरीर के लिए जरूरी है। न एक सीमा से ज्यादा, न ही बहुत कम। इसीलिए तेलों को बदल-बदलकर खाना एक बेहतर तरीका होता है। इससे तीनों फैट हमारे शरीर को मिलते रहते हैं और उनकी अधिकता भी नहीं होती। इसके अलावा किचन में कम से कम दो तरह के तेल इसलिए भी रखने चाहिए क्योंकि हर तेल डीप फ्राई के लिए अच्छा नहीं होता। उदाहरण के लिए ऑलिव आयल। यह हर तरह से अच्छा है, लेकिन तलने के लिए नहीं। तो डीप फ्राई के लिए मूंगफली, सनफ्लावर या सोयाबीन का तेल इस्तेमाल करें। बघार के लिए सरसों या ऑलिव ऑयल का यूज किया जा सकता है। कभी-कभी घी का भी इस्तेमाल करना बेहतर रहेगा।


कितना तेल खाएं?


फलां तेल दिल के लिए अच्छा है, फलां नहीं, सब व्यर्थ की बातें हैं। तेल तो कोई सा भी हो, ज्यादा मात्रा में खाने पर सेहत के लिए हानिकारक ही होता है। एक वयस्क व्यक्ति को रोजाना अधिकतम तीन चम्मच तेल ही खाना चाहिए। तीन चम्मच का मतलब है करीब 20 मिली तेल। यानी महीने में लगभग आधा लीटर तेल। अर्थात अगर छोटे-बड़े मिलाकर चार सदस्य हैं तो दो या ढाई लीटर से ज्यादा तेल की खपत नहीं होनी चाहिए। छौंक, अचार, डीप फ्राई सब मिलाकर।

घर की डीप फ्राई चीजें अच्छी होती हैं?


डीप फ्राइड चीजें खाने के शौकीन अक्सर यह तर्क देते हैं कि वे घर पर खाते हैं, बाहर नहीं। इसलिए महीने में एक-दो बार तला हुआ खा सकते हैं। अगर आप 40 पार हो गए हैं तो डीप फ्राइड चीजें खाना तो बंद ही कर दीजिए, चाहे घर की हों या बाहर की। बाहर की चीजें ज्यादा नुकसान करती हैं, लेकिन घर पर खाएंगे तो भी सेहत के लिए नुकसानदायक ही होगा। क्योंकि डीप फ्राइड चीजें खाने का सीधा-सा मतलब होगा अपने रोज के तीन चम्मच तेल के कोटे या महीने के आधा लीटर के कोटे को पार करना। तो ऐसे में दिल हमेशा खतरे में रहेगा।

कैसे बचें बार-बार इस्तेमाल से?

एक बार तलने के लिए इस्तेमाल किए गए तेल को दोबारा बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। रेस्तरां और ढाबे आदि में एक ही तेल को बार-बार इस्तेमाल किया जाता है, इसीलिए जो लोग बाहर खाना खाते हैं, उनको दिल की बीमारी होने की आशंका ज्यादा होती है। घर पर अगर आप इस स्थिति से बचना चाहते हैं तो तलने के लिए छोटी और गहरी कड़ाही का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे तेल कम बचेगा।



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how to use oil for better health, diet suggation by dr. shikha sharma

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सीने से पेट तक जुड़ी थीं जुड़वां बच्चियां, साढ़े चार घंटे ऑपरेशन कर अलग किया


वाराणसी (अमित मुखर्जी). वाराणसी के बीएचयू हॉस्पिटल (बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी) में 4 दिन की जुड़वां बच्चियों को ऑपरेशन कर अलग किया गया। दोनों बच्चियां सीने से पेट तक आपस में जुड़ी थीं। उन्हें अलग करने के लिए 20 डॉक्टरों की टीम को साढ़े 4 घंटे का समय लगा। डॉक्टर वैभव पांडेय ने बताया कि पहले बच्चियों का ब्लड प्रेशर, शुगर, हार्ट बीट टेस्ट करके देखा गया था। दोनों बच्चियों को एक साथ बेहोश करना बड़ा चैलेंज था। उन्होंने बताया कि 10 लाख बच्चों में से कोई एक जुड़वां इस तरह पैदा होता है। फिलहाल दोनों स्वस्थ हैं। कुछ दिन तक उन्हें डॉक्टरों की निगरानी में रखा जाएगा।

  1. डॉ. वैभव ने बताया कि ऑपरेशन के लिए रेडियोलॉजी, एनेस्थीसिया और ऑपरेशन थियेटर एक्सपर्ट्स की दो टीमें बनानी पड़ीं। दो मॉनीटर और ब्लड समेत सभी इंतजाम डबल किए थे, क्योंकि लिवर से काफी खून बहता है। इसके बाद दोनों बच्चियों को अलग किया गया।

  2. खास बात ये रही कि दोनों बच्चियों के दो दिल थे। इस कारण उन्हें बचाया जा सका। यदि दोनों में एक दिल होता तो कोई एक ही बच सकती थी।एमएस डॉ. वीएन मिश्रा ने बताया कि आमतौर पर इस तरह के ऑपरेशन में करीब 6 लाख रुपए खर्च होते हैं। लेकिन दोनों बच्चियों के सभी टेस्ट और ऑपरेशन नि:शुल्क किए गए।

  3. उन्होंने कहा कि दोनों बच्चियों ने रविवार को गाजीपुर के अस्पताल में जन्म लिया था। केस गंभीर होने के कारण उन्हें बीएचयू रैफर किया गया था। बच्चियों के पिता राजेश कुमार एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं। ये बच्चियां उनकी पहली संतान हैं।



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      newly birth twin gets separated by 4 hour surgery in bhu varanasi

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मंदिरों के प्रसाद से निकलकर घर के नाश्ते तक आया है अप्पम


लाइफस्टाइल डेस्क. मंदिरों और गुरुद्वारों में परोसा जाने वाले भोजन अतुलनीय होता है। और क्यों न हो? यह सर्वश्रेष्ठ खाद्य सामग्री से और पूरी श्रद्धा व भक्ति के साथ बनाया जाता है। पुजारियों द्वारा पहले इसे भगवान को भोग लगाया जाता है। और फिर वही हमें प्रसाद के रूप में मिलता है। हमारे यहां प्रसाद का बड़ा सम्मान है। प्रसाद ग्रहण करना देवताओं के प्रति सम्मान दिखाने का ही एक तरीका है। शेफ, फूड प्रजेंटेटर और राइटर हरपाल सिंह सोखीआज बात कर रहे हैं दक्षिण भारत के मंदिरों में चढ़ाए जाने वाले ऐसे ही एक प्रसाद और प्रसिद्ध डिश अप्पम की...

भगवान विष्णु के कूर्म अवतार से प्रेरित है अप्पे का आकार

'अप्पम' प्राचीनकाल से ही प्रचलन में रहा है। प्राचीनकाल में जौ या चावल के आटे को देसी घी में हल्की आंच में काफी देर तक पकाया जाता था। इसे मीठा बनाने के लिए इसमें शहद डाला जाता था। उस समय इसे 'अपूपा' कहते थे। संगम काल (प्राचीन तमिलनाडु और केरल में ईसा से 300 साल पूर्व से लेकर 300 ईस्वीं तक) में यही विधि 'अप्पम' के रूप में सामने आई। अप्पम का जिक्र कई तमिल साहित्यिक ग्रंथों में मिलता है। वैदिक काल में अपूपा देवताओं का प्रिय होता था और मुख्य प्रसाद के रूप में इसका भोग लगाया जाता था। अपूपा को कछुए जैसा आकार दिया जाता था। इस आकार के पीछे भी धार्मिक महत्व था। भगवान विष्णु का एक अवतार कूर्म (कच्छप) भी माना जाता है। आज अप्पम को ऐसे स्पेशल सांचे में बनाया जाता है ताकि उससे कछुए जैसा फील आ सके। इस सांचे को 'अप्परकारा' कहा जाता है जिसमें बड़े आकार के छिद्र होते हैं। 'अप्पम' को डोसे जैसा भी बनाया जाता है और इडली जैसा बॉल्स के रूप में भी।

ग्यारहवीं सदी में दक्षिण के मंदिरों में 'नेयप्पम' और 'अधिरासम' काफी प्रसिद्ध भोग हुआ करते थे। ये चावल, गुड़ और घी से बनाए जाते थे। यही आज की अप्पम बनाने की रेसिपी है। हालांकि घोल का आटा मंदिर या समाज के अनुसार बदलते रहता है। कुछ लोग चावल की जगह मैदा, पोहे या सेवइयां भी इस्तेमाल में लाते हैं।

अप्पम खाने से भगवान विष्णु का नाम पड़ा अप्पला रंगनाथन

अप्पम दक्षिण भारत के अयप्पा, गणपति, कृष्ण और देवी के मंदिरों में प्रसाद के तौर पर बनाए जाते हैं। केरल के सबरीमाला के अयप्पा और गुरुवायुरप्पन मंदिरों में मिलने वाला अप्पम का प्रसाद सबसे स्वादिष्ट माना जाता है। तमिलनाडु के अप्पाकुडदाथन पेरुमल मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यहां ऐसी मान्यता है कि एक बार भगवान विष्णु एक बुजुर्ग व्यक्ति के रूप में उपस्थित हुए तो उन्हें वहां के राजा उबहरिसारावासु ने बर्तन भरके अप्पम दिए। इस पर भगवान विष्णु उसे लेकर वहीं नीचे बैठ गए और उन्होंने जमकर अप्पम का लुत्फ उठाया। इसी वजह से यहां के भगवान 'अप्पाकुडदाथन' या 'अप्पला रंगनाथन' कहे जाते हैं।

दक्षिण भारत में अप्पम को कई नामों से जाना जाता है। केरल में अप्पम, यूनिअप्पम (ये आकार में छोटे होते हैं), नेयप्पम (जो घी में पकाए जाते हैं), कुजीअप्पम, गणपित अप्पम और कूट्टप्पम। तमिलनाडु में अप्पम को घी में डीप फ्राई करके बनाया जाता है। दक्षिण कर्नाटक में इन्हें 'अप्पे' कहा जाता है और गणेश पूजा में इनका प्रसाद अनिवार्य रूप से चढ़ाया जाता है। दक्षिण कर्नाटक के कूर्ग में इन्हें 'कज्जाया' कहा जाता है। कर्नाटक में कोंकणी समुदाय के लोग इसे सेवइयों और कटहल या केलों के साथ बनाते हैं। इसे वहां 'मुलिक' कहा जाता है। आंधप्रदेश में इन्हें 'अत्रसालू' या 'अरिसेलू' कहा जाता है। वहां कुछ लोग घी में डीप फ्राई करके भी बनाते हैं जिन्हें 'नेथी अरिसेलू' कहते हैं।

पिछले कुछ सालों से उत्तर भारत में भी अप्पम बनाए जाने लगे हैं जिन्हें 'अप्पे' कहा जाता है। हालांकि ये बॉल आकार के होते हैं। ये सूजी के आटे से बनते हैं और चटनी या सॉस के साथ खाए जाते हैं। हालांकि उत्तर भारतीय लोग इन्हें कभी-कभार केवल पकवान के रूप में खाते हैं। उनके लिए इसका कोई धार्मिक महत्व नहीं है।



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food history by chef harpal singh sokhi- appam: from temples to home

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वैज्ञानिकों ने ततैया की ऐसी प्रजाति ढूंढ़ी, जिसके डंक का जहर सुपरबग को मारेगा


हेल्थ डेस्क. ततैया (वास्प) के डंक का जहर सुपरबग को मारने में कारगर है। सुपरबग एक ऐसा बैक्टीरिया है, जिस पर एंटीबायोटिक का असर नहीं होता। एमआईटी के शोधकर्ताओं के मुताबिक, ततैया की प्रजाति पॉलिबिया पॉलिस्टा में पाया जाने वाला जहर सुपरबग केलिए खतरनाक है, लेकिन इंसानों पर इसका जहरीला असर नहीं होता।

पॉलिबिया पॉलिस्टा के डंक में खास तरह का जहर पाया जाता है जिसे MP1 कहते हैं। इसका इस्तेमाल ततैया अपनी सुरक्षा के लिए करती है। हाल ही में हुए एक और अध्ययन में पाया गया कि ये कैंसर कोशिकाओं को भी खत्म करने में अहम भूमिका निभाता है।

चूहों पर किए गए प्रयोग के बाद मिले नतीजों से पता चला है कि ततैया केजहर में सुपरबग को खत्म करने के लिए जरूरीएंटी-माइक्रोबियल गुण मौजूद हैं। दुनियाभर में डंक मारने वाली ततैया की 30 हजार से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं जो 2 इंच तक बड़ी होती हैं। आमतौर पर घरों में रहने वाली ततैया उतनी जहरीली नहीं होती, जितनी जंगलों में पाई जाने वाली होती है। इसके जहर में एसिटिलकोलिन नामक रसायन पाया जाता है, जिसके गुणों पर दुनियाभर में रिसर्च हो रही है।

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  1. चूहों पर हुई इस रिसर्च में शोधकर्ताओं ने पाया कि ततैया के जहर में मौजूद स्ट्रॉन्ग पेप्टाइड सुपरबग, स्यूडोमोनास एरुजिनोसा को शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है। यह ऐसा बैक्टीरिया है जिसका संक्रमण होने पर सांस लेने में तकलीफ होती है और इन पर एंटीबायोटिक्स का असर नहीं होता।

  2. जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस बायोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट में एमआईटी के प्रोफेसर सीजर का कहना है कि रिसर्च के दौरान जहर में मौजूद पेप्टाइड की संरचना और कार्यों का अध्ययन किया गया है। उनका कहना है कि अब पेप्टाइड की खूबियों और इसके काम करने की दर को बढ़ाया जा सकता है।

  3. ततैया और मधुमक्खी के डंक में मौजूद जहर से बैक्टीरिया को खत्म किया जा सकता है लेकिन ज्यादातर से निकलने वाला जहर इंसान के लिए खतरनाक है। इसलिए इनका इस्तेमाल एंटीबायोटिक ड्रग में नहीं किया जा सकता। हालांकि इंसानों में ऐसे कुछ ऐसे पेप्टाइड बनते हैं जिनकी मदद से बैक्टीरिया को खत्म किया जा सकता है। कई वैज्ञानिक ऐसे पेप्टाइड्स से नई दवा बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

  4. शोधकर्ता के अनुसार, रिसर्च में पॉलिबिया पॉलिस्टा ततैया की प्रजाति के पेप्टाइड का इस्तेमाल किया गया है। स्यूडोमोनास एरुजिनोसा से ग्रसित चूहे को इसकाहाई डोज दिया गया। परिणामों से पता चलाकि करीब 4 दिन बाद संक्रमण दूर हो चुका था।



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      wasp venom fights against superbugs

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इन्दिरा आईवीएफ ग्रुप का 53 वां हॉस्पिटल अब झांसी में


हेल्थ डेस्क.नि:संतानता के ईलाज के क्षेत्र में देश की सबसे बड़ी फर्टिलिटी चेन इन्दिरा आईवीएफ हॉस्पीटल प्रा. लि. अपने ग्रुप का विस्तार करते हुए उतरप्रदेश के झांसी शहर में ‘स्टीफन हाऊस’ मुन्नालाल पॉवर हाऊस के सामने BKD चौराहा के पास, CP मिशन कम्पाउंड में अपने 53वें हॉस्पिटल का भव्य शुभारंभ किया है। नि:संतान दम्पतियों को रियायती दरों पर कुशल ईलाज उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से झांसी में ग्रुप का लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, बरेली, गोरखपुर, मऊ, आगरा, मेरठ, गाजियाबाद के बाद 11वाँ हॉस्पीटल उत्तरप्रदेश में एवं ग्रुप का देश में 53वां हॉस्पिटल है।

इन्दिरा आईवीएफ ग्रुप के चेयरमैन डॉ. अजय मुर्डिया ने अपने संदेश में कहा कि वीरों की नगरी झांसी पर्यटन क्षैत्र में देश में अग्रणी स्थान रखता है, लेकिन यहां पर नि:संतानता के उपचार की समुचित व्यवस्था उपलब्ध नहीं है इस कारण ज्यादातर दम्पती विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श नहीं ले पाते हैं और संतान प्राप्ति से वंचित रह जाते हैं। आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से नि:संतानता का ईलाज संभव है। झांसी में सेंटर की शुरूआत होने से करीबी जिलों, तहसील गांवों के नि:संतान दम्पतियों को पास में ही रियायती दरों पर ईलाज उपलब्ध होगा।

सेंटर की आईवीएफ स्पेशलिस्ट डॉ. साक्षी श्रीवास्तव ने कहा कि यहां नि:संतान दम्पतियों को उचित परामर्श व मार्गदर्शन दिया जाएगा। झांसी सेंटर के शुभारंभ के अवसर पर तथा जागरूकता के उद्देश्य से नि:शुल्क नि:संतानता परामर्श शिविर का आयोजन 8 से 20 दिसम्बर तक केन्द्र पर किया जा रहा है जिसमें नि:संतान दम्पती विशेषज्ञ चिकित्सकों से परामर्श का लाभ ले सकेंगे।



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indira IVF groups 53rd hospital now in Jhansi Uttar Pradesh

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मधुमक्खियों के छत्तों में फैला जानलेवा संक्रमण, रानी मक्खी बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने बनाया अनोखा वैक्सीन


हेल्थ डेस्क. वैज्ञानिकों ने खासतौर पर मधुमक्खियों के लिए एक वैक्सीन तैयार की है जो उन्हें बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण से बचाएगी। इसे फिनलैंड की हेल्सिंकी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने बनाया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह वैक्सीन अमेरिकन फाउलब्रूड नाम की बैक्टीरियल डिजीज से लड़ने के लिए बनाई गई है। ये बीमारी मधुमक्खियों की पूरी कॉलोनी को नष्ट कर देती है। उनका कहना है कि परागण के बाद मुधमक्खियां मर रही हैं और इनकी संख्या कम हो रही है जिसका असर खाद्य अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। एक छोटा सा प्रयास भी वैश्विक स्तर पर बदलाव ला सकता है।

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  1. हेल्सिंकी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डेलियल फ्रेटक के अनुसार,यह वैक्सीन खाने योग्य है इसलिए आसानी से मधुक्खियों को बीमारियों से बचाया जा सकता है। इसके अलावा शहद से तैयार होने वाले खाद्य पदार्थों को सुरक्षित किया जा सकेगा। अमेरिकन फाउलब्रूड बैक्टीरिया से होने वाला संक्रामक रोग है जो पेनिबेसिलस लार्वो से फैलता है। यह संक्रमण तब होता है जब मधुक्खियों का लार्वा और प्यूपा विकसित हो रहा होता है।

  2. वैक्सीन के अनुसार, इसे अभी और विकसित किया जा रहा है। कीट-पतंगों के रोग प्रतिरोधी तंत्र (इम्यून सिस्टम) में एंटीबॉडीज नहीं पाई जाती है इसलिए ऐसी स्थिति में बैक्टीरियल इंफेक्शन रोकने के लिए परंपरागत वैक्सीन का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

  3. शोधकर्ताओं ने एक शुगर केक का इस्तेमाल करके वैक्सीन देने का तरीका ढूंढा है। जिसे छत्ते में रख दिया जाता है जो करीब एक हफ्ते तक रानी मधुमक्खी खाती है। खाने के बाद इसके बैक्टीरिया मधुमक्खी के अंडों के रूप में बाहर निकल जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, अमेरिकन फाउलब्रूड को पूरी तरह से खत्म करना मुश्किल है। ऐसे में छत्तों को उजाड़ देना या संक्रमित हिस्सों को पता करके खत्म करना ही उपाय बचता है।

  4. यह बीमारी कैसे फैलती है, इसके बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि बैक्टीरियल स्पोर्स (जीवाणु जो बढ़कर एक नया प्राणी हो जाता है) आसानी से मधुमक्खियों की कॉलोनी और छत्तों बिखर जाते हैं। छत्तों काे एक जगह से दूसरी जगह ले जाने पर फैलते हैं। बैक्टीरियल स्पोर्स का जीवनकाल करीब 50 साल होता है जिन पर तापमान अधिक बढ़ने और कम होने का प्रभाव नहीं पड़ता है।

  5. पर्यावरण के लिए काम करने संगठन ग्रीनपीस के मुताबिक दुनियाभर में 80 फीसदी परागण घरेलू और जंगली मधुमक्खियां करती हैं। ग्रीनपीस के अनुसार, पेस्टिसाइड्स, उजड़ते छत्ते, सूखा, ग्लोबल वॉर्मिंग और वायु प्रदूषण के कारण मधुमक्खियां मर रही हैं। संगठन का कहना है कि मानव निर्मित पेस्टिसाइड्स और इनके वासस्थान को उजाड़ना खासतौर बड़ी वजहे हैं।



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      bee vaccine save honeybees against American foulbrood

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जितनी लंबी नींद, उतना ही बढ़ सकता है हृदय रोग होने और जान जाने का खतरा


हेल्थ डेस्क. एक नई रिसर्च के मुताबिक जरूरत से ज्यादा नींद लेना हृदय रोग का खतरा और जान जाने का जोखिम बढ़ाता है। चीन में मैकमास्टर एंड पीकिंग यूनियन मेडिकल कॉलेज में हुई रिसर्च में यह सामने आया है कि रात की नींद जितनी लंबी होगी, यह खतरा उतना ही बढ़ता जाएगा।

  1. शोध में 21 देशों के 11,700 लोगों को शामिल किया गया, जिनकी उम्र 35 से 70 साल के बीच थी। रिसर्च आठसाल चली। इसमें पता चला कि ऐसे 1000 लोग जिन्होंने हर रात 6-8 घंटे की नींद ली, उनमें से 7.8% लोगों में हृदय रोग (स्ट्रोक या हार्ट फेल्योर) के मामले देखे गए। वहीं, ऐसे 1000 लोग जो 8-9 घंटे सोए, उनमें 8.4% और 9-10 घंटे नींद लेने वालों में 10.4% लोग हृदय रोग से जूझते देखे गए।

  2. मैकमास्टर एंड पीकिंग यूनियन मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर चुआंगशी वांग के मुताबिक, ज्यादा नींद लेने का हृदय रोग होने और मौत का खतरा होने से संबंध इस आधार पर तय किया गया कि शरीर से जुड़ी कई ऐसी स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं जो इंसान को लंबी नींद लेने के लिए उकसाती हैं।

  3. हालांकि, ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन में सीनियर कार्डियक नर्स जूली वार्ड बताती हैं कि रिसर्च से जुड़ी बातें काफी दिलचस्प हैं, लेकिन यह हृदय रोग और मौत या शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव के कारणों को साबित नहीं कर पातीं।

  4. यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित इस रिसर्च के मुताबिक, दिन में ली गई झपकी और रात में ली गई ज्यादा नींद को हृदय रोगों का एक कारण बताया गया है, लेकिन कम नींद लेने पर सेहत पर क्या परिणाम दिखाई देंगे, इसका जिक्र नहीं किया गया।

  5. ब्रिटेन की वारविक यूनिवर्सिटी के कार्डियोवेस्कुलर मेडिसिन के प्रोफेसर फ्रांसेस्को बताते हैं कि ऐसा नहीं है कि लंबी नींद लेने से ही कोई बीमारी हो सकती है। कुछ मामलों में शरीर में पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याएं भी बीमारियां होने का कारण बन सकती हैं।



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      Too Much Sleep May Bring Heart Disease and Death Risk says chines scientist

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दुनिया के सबसे मोटे व्यक्ति जुआन का वजन 2 साल में 300 किलो घटा, गंवाया वर्ल्ड रिकॉर्ड


हेल्थ डेस्क. मैक्सिको के जुआन पेड्रो फ्रैंको (34) ने दुनिया के सबसे वजनी व्यक्ति का रिकॉर्ड गंवा दिया है। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड से नाम हटने पर जुआन को कोई दुख नहीं, बल्कि खुशी है। 595 किलोग्राम के जुआन का वजन बैरियाट्रिक सर्जरी की वजह से अब 304 किलो रह गया है। दो साल के भीतर उनकी कई सर्जरी की गईं। जुआन खुश हैं कि अब वो बिस्तर से उठकर चल-फिर सकते हैं। अब उनका लक्ष्य अपना वजन 138 किलो करना है।

  1. जुआन ने बताया कि उनके मोटापे की वजह बीमारी थी। 6 साल में ही उनका वजन 60 किलो हो गया था। इसके बाद हर साल उनका वजन करीब 9 किलो तक बढ़ता रहा।

    पहले महज 6 कदम चलने पर थक-हारकर बैठ जाता था, लेकिन अब 100 कदम से ज्यादा चल सकता हूं।

    जुआन
  2. जुआन आर्थिक स्थिति ठीक ना होने के कारण पौष्टिक भोजन नहीं ले पा रहे थे। इसके बाद 17 वर्ष की उम्र में उनका कार एक्सीडेंट हो गया।

  3. एक्सीडेंट की वजह से जुआन कोकाफी वक्त घर पर बिताना पड़ा और इसके चलते वजन और बढ़ता गया। ज्यादा वजन की वजह से उन्हें करीब 6 साल बिस्तर पर ही बिताने पड़े।

  4. मैक्सिको के ग्वाडलहारा के हॉस्पिटल में जुआन की सर्जरी की गई। जुआन को स्पेशल हाईटेक एंबुलेंस से अस्पताल लाया गया।

  5. डॉक्टरों के मुताबिक, पहले यह पता लगाया गया कि जुआन सर्जरी के बाद चल-फिर पाएंगे या नहीं। ज्यादा वजन की वजह से ट्रीटमेंट में भी दिक्कतें आईं।

  6. डॉक्टरों ने कहा- सर्जरी के बाद जुआन चल-फिर पा रहे हैं। उन्हें कुछ महीने हॉस्पिटल में ही रखा जाएगा। इलाज के अगले चरण में उनकी मांसपेशियों को मजबूत करने पर फोकस किया जाएगा।



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      Worlds heaviest man Juan loses 300 kg along with Guinness World Record
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19 साल की कीरा को गाने से पड़ते थे दौरे, पर शौक को जिंदा रखने के लिए संगीत बजाकर कराई सर्जरी


हेल्थ डेस्क. कीरा को बचपन से गाने का शौक है। करीब चार पहले उन्हें गाना गाते समय आवाज में अजीब सा बदलाव दिखा। जब वो कुछ गुनगुनाती थीं या संगीत सुनती थीं तो उनकी अावाज अटकने लगती थीं। एमआरआई में सामने आया कि कि वॉशिंग्टन में रहने वाली 19 साल की गायिका कीरा अजीबोगरीब बीमारी म्यूजिकोजेनिक एपिलेप्सी से जूझ रही हैं।

जांच रिपोर्ट के अनुसार, दिमाग का वह हिस्सा जो सुनने और गुनगुनाने की क्षमता नियंत्रित करता है वहां छोटे पत्थर के आकार का ट्यूमर है, जो इस डिसऑर्डर का कारण है। हाल ही में की गई इनकी सर्जरी काफी चर्चित रही। ब्रेन सर्जरी के दौरान पीड़िता गाना गुनगुना रही थीं और डॉक्टर्स ऑपरेशन के दौरान दिमाग के उस हिस्से को बचाने की कोशिश कर रहे थे जो सुनने और गुनगुनाने के लिए जिम्मेदार है।

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क्या है म्यूजिकोजेनिक एपिलेप्सी
यह एक दुर्लभ बीमारी है जो संगीत से जुड़ी है। इसमें संगीत सुनने, गाने और उसके सोचने भर से ही दौरे पड़ते हैं। दौरे का स्तर कितना गंभीर हैं यह संगीत की उत्तेजना पर निर्भर करता है। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार दौरे की गंभीरता संगीत के प्रकार (जैज, क्लासिकल, कोरल) पर भी निर्भर करती है। एपिलेप्सी सोसायटी के मुताबिक, चर्च की घंटी या किसी खास तरह का इंस्ट्रूमेंट भी दौरे का कारण बन सकता है।

सर्जरी से पहले मैं काफी डरी हुई थी लेकिन अब मैं काफी खुश हूं और जल्द से जल्द ही वापस स्टेज पर जाकर परफॉर्म करना चाहती हूं।

कीरा

गिटार बजाकर की सफल सर्जरी की पुष्टी
सर्जरी करने वाले डॉ. जेसन हॉपमैन के मुताबिक, सर्जरी से पहले कीरा ने कहा था कि वह भविष्य में अपने सिंगिंग टैलेंंट को बरकरार रखना चाहती हैं। इसलिए टीम ने तय किया वे इनके गाने की क्षमता को नुकसान नहीं पहुंचने देंगे। सर्जरी में ट्यूमर को निकालने के दौरान इस बात का ध्यान रखा गया। मरीज की ‘अवेक क्रेनियोटॉमी’ की गई जो एक तरह की ब्रेन सर्जरी है जिसमें मरीज होश में रहता है। हॉस्पिटल के मुताबिक, सर्जरी के दौरान संगीत चल रहा था ताकि मरीज आवाज को लेकर कोई खतरा न महसूस कर सके। डॉक्टर के मुताबिक, ऐसा पहली बार हुआ है जब सर्जरी के दौरान मरीज गुनगुना रहा हो। ऑपरेशन थियेटर में सर्जरी के पहले कीरा ने गाना गाया और सर्जरी के बाद गिटार बजाकर सफल इलाज की पुष्टी की।



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teenage girl singing during brain surgery to preserve her musical talent
teenage girl singing during brain surgery to preserve her musical talent
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सोने के कणों से कैंसर का पता लगेगा, नए टेस्ट से 10 मिनट में 90% सटीक रिपोर्ट मिलेगी


हेल्थ डेस्क. शोधकर्ताओं ने एक नई तरह का टेस्ट विकसित किया है जो हर तरह के कैंसर का पता लगाने में सक्षम है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह टेस्ट डीएनए की संरचना पर आधारित है। यह 10 मिनट के अंदर कैंसर और उसके प्रकार का पता लगा सकता है। टेस्ट में सोने के कणों का इस्तेमाल किया गया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक कैंसर का डीएनए सोने के कणों की ओर ज्यादा आकर्षित होता है। इस टेस्ट का क्लीनिकल ट्रायल जल्द ही किया जाएगा। यह रिसर्च ऑस्ट्रेलिया की क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने की है। इसे नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित किया गया है।

  1. शोधकर्ताओंं के मुताबिक, हर तरह का कैंसर, चाहे पेट का हो या ब्रेस्ट का, उसकी उत्पत्ति और खासियत अलग-अलग होती है। ज्यादातर मेडिकल टेस्ट किसी खास तरह के कैंसर पता लगाते हैं, लेकिन नया टेस्ट डीएनए बेस्ड है। शोध में पता चला है कि ब्रेस्ट, प्रोस्टेट, बॉवेल कैंसर और लिम्फोमा की जांच वाले सैम्पल में मौजूद डीएनए की संरचना एक जैसी होती है।

  2. वर्तमान में कैंसर की जांच के लिए बायोप्सी की जाती है। इसमें सर्जरी की मदद से ट्यूमर का छोटा-सा हिस्सा लिया जाता है। नई रिसर्च का लक्ष्य जांच के ऐसे तरीके को विकसित करना था, जिसमें चीर-फाड़ कम हो और शुरुआती स्टेज में ही कैंसर का पता लगाया जा सके।

  3. इंसान में मौजूद हर कोशिका में एक तरह का ही डीएनए होता है। लेकिन अध्ययन के दौरान पाया गया कि कैंसर की शुरुआत होने पर डीएनए में कई बदलाव होने लगते हैं।नॉर्मल डीएनए में मौजूद मिथाइल ग्रुप के कारण इसकी संरचना खास होती है और यह अपना काम ठीक तरह से कर पाता है, लेकिन कैंसर की स्थिति में इसकी संरचना में बदलाव होता है और कैंसर कोशिकाएं तेजी से बढ़ने लगती हैं।

  4. लैब में इसका पता लगाने के लिए साेने का इस्तेमाल किया गया। रिसर्च में सामने आया कि कैंसर वाले डीएनए सोने के कणों की ओर ज्यादा आकर्षित होते हैं। वैज्ञानिकों ने इसे और भी बेहतर तरीके से समझने के लिए टेस्ट किया।

  5. जांच के दौरान डीएनए को सोने के कणों के साथ सॉल्यूशन में मिलाया।नतीजे के तौर पर संरचना के रंग में बदलाव दिखा। 5 मिनट के अंदर ही ट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी से कैंसर वाले डीएनए की पहचान हो गई।

    • रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अब तक 200 टिश्यू और ब्लड सैम्पल लिए गए, जिसके 90% परिणाम सटीक मिले हैं।
    • इस टेस्ट की मदद से ब्रेस्ट, प्रोस्टेट, बॉवेल कैंसर और लिम्फोमा को डिटेक्ट करने में मदद मिली।
    • रिपोर्ट के मुताबिक, क्लीनिकल ट्रायल इसका अगला चरण है। साथ ही बॉडी में मौजूद तरल के आधार पर कैंसर को पहली स्टेज में कैसे पता लगाया जाए, इस पर फोकस किया जाएगा।


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      a test uses gold particle can detect all type of cancer in 10 minutes

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गैजेट्स की बजाय पुराने खेलों से बच्चों में आती है ज्यादा समझदारी: रिसर्च


हेल्थ डेस्क. बच्चों के सोचने-समझने की क्षमता को बढ़ाना है तो उनके साथ ब्लॉक और पजल जैसे गेम्स खेलें। उन्हें गैजेट्स से दूर रखें। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स जर्नल में प्रकाशित रिसर्च में यह कहा गया है। इसमें शिशु रोग विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि बच्चों के लिए पुराने परंपरागत खेल ही बेहतर हैं। इस दौरान बच्चे माता-पिता के साथ ज्यादा खुशी महसूस करते हैं।

महंगे खिलौने और गैजेट्स विकास में अहम भूमिका नहीं निभाते
शोध से जुड़े डॉ. एलन मेंडलसन कहते हैं कि पांचसाल तक के बच्चों के लिए कार्ड बोर्ड को एक खेल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे आसानी से घर पर भी बनाया जा सकता है। कई माता-पिता गैजेट और खिलौने के विज्ञापन देखकर उनके प्रभावमें आ जाते हैं। उन्हें लगता है ये प्रोडक्ट्स बच्चों का ज्ञान और दिमागी स्तर बढ़ाने का काम करते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। अभिभावकों का यह सबसे बड़ा भ्रम है कि महंगे खिलौने बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता बढ़ाने मेंअहमहैं। डॉ. एलन के मुताबिक, जब बच्चे और अभिभावक, दोनों साथ में खिलौने खेलते हैं तो उनके विकास में सकारात्मक बदलाव आता है।

ये आदतें बन सकती हैं मोटापे का कारण

  • अध्ययन के मुताबिक, बच्चों का इलेक्ट्रॉनिक गैजेट से अधिक जुड़ाव उनके बोलने और भाषा के विकास में बाधा बन सकता है। इसके साथ ये मोटापे का कारण बनता है।
  • शोध में पाया गया कि अमेरिका के करीब 90% बच्चे 1 साल की उम्र से ही मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं।
  • शिशु रोग विशेषज्ञों के मुताबिक, करीब 2 साल की उम्र तक बच्चों का मोबाइल या टेबलेट स्क्रीन से सामना नहीं होना चाहिए।
  • ऐसे बच्चों को दिनभर टीवी और कम्प्यूटर स्क्रीन के साथ 1 घंटेसे अधिक समय नहीं बिताना चाहिए।
  • बच्चों को इलेक्ट्रॉनिक गैजेट की आदत बाद में उसे कंट्रोल करने में दिक्कत पैदा कर सकती है।
  • बच्चों के लिए बॉल, पजल, चित्रों में रंग भरना और कार्ड गेम्स बेहतर हैं।

बच्चों के व्यवहार में बदलाव
एक महिला लेह ग्राहम स्टीवर्ट इस बात काे समझने के लिए ऐसे टॉय स्टोर पर गईं जहां इलेक्ट्रॉनिक गैजेट नहीं बेचे जाते हैं। उनके मुताबिक स्टोर में मौजूद दो बच्चे आईपैड पर गेम खेलने के बाद काफी गलत व्यवहार कर रहे थे और उन्होंने बच्चों को बाहर जाकर खेलने काे कहा। स्टोर की मालिक एरिका के मुताबिक, हमारा लक्ष्य बच्चों को टेक्नोलॉजी से जुड़े खिलौने का विकल्प उपलब्ध कराना है।



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traditional Toys and games Are Better for Toddlers Than High Tech Gadget

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टीकाकरण में लापरवाही के कारण दुनियाभर में चेचक के मामले 31% बढ़े


हेल्थ डेस्क. 2017 में दुनियाभर में चेचक के मामले 31% बढ़े गए। ऐसा टीकाकरण में लापरवाही के कारण हुआ। इसका खुलासा विश्व स्वास्थ्य संगठन और सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन की रिपोर्ट से हुआ। हाल ही में जारी रिपोर्ट के मुताबिक 2000 से 2017 के बीच चेचक के मामलों में करीब 83% कमी आई, लेकिन पिछला साल सामान्य नहीं रहा।

अमेरिका और यूरोप में बढ़े रोगी
शोधकर्ताओं के मुताबिक, बढ़े हुए रोगियों की संख्या खासतौर पर ऐसे क्षेत्र में देखी गई जहां विशेष नजर रखी जाती है। सबसे ज्यादा मामलों वाले देशों मेंं अमेरिका और यूरोप जैसे देश शामिल है। केवल पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में मामलों में कमी देखी गई है।

क्या है चेचक?
चेचक एक वायरस के संक्रमण से होने वाली बीमारी है, जो काफी गंभीर मानी जाती है। चेचक की स्थिति में शरीर पर रैशेज, तेज बुखार और खांसी जैसे लक्षण देखे जाते हैं। गंभीर स्थिति में दिमाग में सूजन, निमोनिया, आंखों की रोशनी कम होना या मौत भी हो सकती है। चेचक के वायरस को वैक्सीन की दो डोज से रोका जा सकता है।

अक्सर चेचक के मामले बच्चों में अधिक देखे जाते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है, यह बड़ों को नहीं हो सकता। चिकनपॉक्स का टीका जरूर लगवाना चाहिए। यह एक वायरल इंफेक्शन है। संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने पर रोग हो सकता है। इसलिए यह रोगी के खांसने, छींकने पर भी हो सकता है। खासकर गर्भवती महिलाओं को खास सावधानी बरतनी चाहिए वरना बच्चे को नुकसान पहुंच सकता है। अगर महिला को कभी चेचक नहीं हुआ हो तो खतरा और बढ़ जाता है।

डॉ. पंकज आनंद, फिजिशियन, जयपुर

जहां रोग खत्म हुआ, वहीं अब रोगी बढ़े
रिपोर्ट के अनुसार, चेचक के मामले ऐसे देशों में बढ़े हैं जहां इसे पूरी तरह से खत्म कर दिया गया था। इसका कारण वैक्सीन न लगाया जाना बताया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वैक्सीन लेने में काफी अंतर होने पर करीब 1 लाख 10 हजार मौतें हुईं। WHO के अनुसार, 2000 में दुनियाभर जब टीकाकरण की शुरुआत की गई थी तो 85 फीसदी लक्ष्य रखा गया था, जिसमें सुधार भी देखा गया था। अभी भी स्वास्थ्य अधिकारियों का लक्ष्य 95 फीसदी से नीचे है। जबकि इसकी दूसरी खुराक टारगेट के मुकाबले 67 फीसदी लोगों को दी गई थी।



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Measles Cases rise in 2017 up to 30 percent due to Gaps in Vaccination

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राग दरबारी और भीमपलासी सुनिए; गुस्सा, तनाव कम होगा, आईआईटी कानपुर ने किया शोध


हेल्थ डेस्क@ विजय उपाध्याय. लखनऊ. अगर आपके दिमाग पर तनाव हावी रहता है तो रात में राग दरबारी का लुत्फ उठाइए। तनाव छूमंतर हो जाएगा। दोपहर में राग भीमपलासी सुनना भी दिमाग को शांत रखने, तनाव को कम करने में मददगार होता है। यही नहीं, डायबिटीज या दिल से जुड़ी कोई बीमारी है तो भी अलग-अलग राग इन बीमारियों से लड़ने में आपकी मदद कर सकते हैं। रागों का इंसान के दिलो-दिमाग पर पड़ने वाले असरों पर आईआईटी-कानपुर ने अध्ययन किया है।

हृदय रोगोंं से एसिडिटी के लिए तय किए गए राग
रिपोर्ट के अनुसार, अगर आपको गुस्सा आता है, तो राग सहाना सुनिए। दिमाग शांत होगा, गुस्सा कम होगा। पेट से जुड़ी कोई समस्या है तो राग पूरिया धनाश्री, एसिडिटी है तो राग दीपक और राग जौनपुरी सुनना चाहिए। हृदय रोग से परेशान हैं तो सारंग वर्ग के राग, कल्याणी और चारुकेसी। सिरदर्द है तो राग आसावरी, पूर्वी और राग तोड़ी सुन सकते हैं।

100 सेकंड में बढ़ जाती है न्यूरॉन की सक्रियता
ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंस के प्रोफेसर बृजभूषण, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. लक्ष्मीधर बेहरा और शोधार्थी आशीष गुप्ता इस रिसर्च टीम में हैं। इंस्टीट्यूट के ही कुछ ऐसे छात्रों पर शोध किया गया, जिन्होंने पहले कभी राग दरबारी नहीं सुना था। 10 मिनट तक उन्हें राग सुनाया गया। ईईजी टेस्ट से पता चला कि- राग सुनने के दौरान महज 100 सेकंड में ही दिमाग के न्यूरॉन्स की सक्रियता बढ़ जाती है।

रात में दिमाग ज्यादा सक्रिय रहता है
राग से दिमाग में न्यूरल फायरिंग बढ़ती है इसलिए यह हिस्सा ज्यादा सक्रिय होता है। आम तौर पर दिमाग में न्यूरल फायरिंग सही तरीके से नहीं होती है। दिमाग के अगले हिस्से के न्यूरॉन्स मध्य हिस्से तक ही जा पाते हैं। यदि ये पीछे तक जाएं तो इससे सोचने, समझने की क्षमता बढ़ती है। राग सुनने पर न्यूरॉन्स के पिछले हिस्से तक पहुंचने के संभावना बढ़ने लगती है। प्रोफेसर बृजभूषण के मुताबिक, राग दरबारी सुनने के बाद एकाग्रता, बौद्धिक क्षमता बढ़ जाती है।



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raag darbari bheem palasi decreases depperesion iit kanpur research

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आपका मोबाइल टॉयलेट सीट से 7 गुना ज्यादा गंदा, लेदर केस में 17 फीसदी अधिक बैक्टीरिया


हेल्थ डेस्क. संक्रमण का एक कारण मोबाइल भी हो सकता है। हालिया रिसर्च में दावा किया गया है कि टॉयलेट सीट से 7 गुना ज्यादा बैक्टीरिया मोबाइल फोन में पाए जाते हैं। यानी मोबाइल सात गुना ज्यादा गंदा है। शोध में 50 मोबाइल फोन्स को जांच गया। रिपोर्ट में सामने आया कि लेदर मोबाइल कवर में टॉयलेट सीट से 17 गुना ज्यादा बैक्टीरिया थे। सर्वे कंपनी इनीशियल वॉशरूम हायजीन ने की है।

कहां पर बैक्टीरिया सबसे अधिक संख्या में मौजूद हैं इसे जानने के लिए कंपनी इनीशियल वॉशरूम हायजीन ने सर्वे किया। शोध में टॉयलेट सीट के 220 साफ हिस्सों के और मोबाइल के 1,473 सेंपल लिए गए। एबरडीन यूनिवर्सिटी के बैक्टीरियोलॉजी के प्रोफेसर हग पेनिंगटन के मुताबिक, मोबाइल का सेंपल लेना बिल्कुल रूमाल की जांच करने जैसा ही है। जहां किटाणुओं की भरमार होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इन दोनों का इस्तेमाल अधिक किया जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, मोबाइल फोन्स में जीवाणुओं की संख्या इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि इसे बॉथरूम में भी साथ रहता है। इस शोध में 2 हजार लोग शामिल रहे और 40 फीसदी लोगों ने स्वीकारा कि ऑफिस में काम करने के दौरान जब भी बाथरूम जाते हैं तो मोबाइल फोन साथ ही होता है। 20 फीसदी लोगों ने माना कि मोबाइल बाहर रखकर ही टॉयलेट जाते हैं।

2011 में भी लंदन स्कूल ऑफ हायजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन ने रिसर्च में 6 ऐसे मोबाइल फोन पाए थे जिसमें जांच के दौरान ई-कोली बैक्टीरिया की पुष्टि हुई थी। जो फूड पॉइजनिंग और पेट की दूसरी समस्याअों का कारण बन सकता है। पिछले साल स्वास्थ्य देखभाल के लिए काम करने वाले संगठन कंज्यूमर वॉचडॉग ने 30 मोबाइल फोन्स को जांचा था। जिसमें ऐसे बैक्टीरिया की पुष्टि हुई थी जो पेट से जुड़ी बीमारियों का कारण बनते हैं।



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Mobile phones seven times dirtier TOILET SEATS survey says

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एचआईवी से लड़ने के लिए सीएमवी वैक्सीन और जीन एडिटिंग तकनीक होगी मददगार


हेल्थ डेस्क. दुनियाभर में आज का दिन एड्स दिवस (1 दिसंबर) के रूप में मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इस वर्ष की थीम लोगों में ये जागरुकता फैलाना है कि हर व्यक्ति अपने एचआईवी स्टेटस के बारे में जानने की कोशिश करे। दुनियाभर में इसे बीमारी को रोकने के लिए कोशिशें जारी हैं। हाल ही में ओरेजोन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी में विकसित किए गए एचआईवी एड्स के टीके से वनमानुषों में एड्स फैलाने वाले वायरसों के खात्मा करने की क्षमता का प्रदर्शन किया गया। इसी तरह से चीन में जीन एडिटिंग का इस्तेमाल कर एड्स के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित की जा रही है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक इस बीमारी का पहला मामला 1981 में सामने आया था। 2014 में प्रकाशित बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसकी उत्पत्ति किन्शासा शहर में हुई, जो कि अब डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो की राजधानी है। कहा जाता है कि किन्शासा बुशमीट का बड़ा बाज़ार था और इसलिए संभावना है कि संक्रमित खून के संपर्क में आने से ये बीमारी मनुष्यों तक पहुंच गई और आज विकराल रूप धारण कर चुकी है।

डिजाइनर बेबी के जीन में बदलाव कर बढ़ाई प्रतिरोधक क्षमता
चीन में जीन एडिटिंग के जरिए दुनिया का पहला डिजाइनर बेबी तैयार किया गया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस बेबी में एड्स प्रतिरोधक क्षमता औरों से कहीं ज्यादा है। दरअसल चीन में एचआइवी संक्रमण बड़ा खतरा बन चुका है। इसीलिए एचआइवी जीन एडिटिंग प्रयोग किया गया। इसके लिए सीसीआर5 नामक एक जीन को अक्षम किया गया जो एचआईवी वायरस को बढ़ने में मदद करता है। ये वायरस कोशिका में प्रवेश कर एड्स का खतरा पैदा करता है। माता-पिता से बच्चे में एड्स की बीमारी आने की काफी संभावना होती है। फिलहाल बच्चे में एड्स और एचआईवी का खतरा रोकने के लिए कई प्रभावी दवाइयां मौजूद हैं, लेकिन जीन एडिटिंग नई तकनीक है।

4 रिसर्च जो साबित हो रहीं मददगार

1- डीएनए में एडिटिंग :सेल्यूलर डीएनए की एडिटिंग करने का कॉन्सेप्ट एक ऐसा कॉन्सेप्ट है, जिससे इस समय दुनिया को सबसे अधिक उम्मीद है। इसमें मरीज की उस जीन को निकालकर अलग कर देते हैं, जो नई सेल्स में भी एचआईवी वायरस फैलाती है। बाद में मरीज में नई सेल्स इंजेक्ट कर दी जाती हैं। ऐसा पहली बार है, जिसमें वैज्ञानिकों ने एचआईवी के डीएनए को ही जिंदा जावनरों के सेल से अलग किया है।


2- सीएमवी वैक्सीन :ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी मुख्य रूप से साइटोमेगालोवायरस (सीएमवी) वैक्सीन पर काम कर रही है। इस टीके की खास बात यह है कि यह न केवल एड्स के वायरस को शरीर में प्रवेश करने से रोकेगा, बल्कि उम्मीद है कि यह शरीर में फैले एचआईवी वायरस को खत्म भी करेगा और संक्रमित कोशिका को दोबारा ठीक करेगा।

3- प्रोफीलैक्सिस पिल्स :दो वर्ष पूर्व एड्स के इलाज के लिए दवाइयां बना रहे रिसर्चर्स को तब एक बड़ी राहत मिली, जब उन्होंने प्री-एक्स्पोजर प्रोफीलैक्सिस एंटी-एचआईवी टैबलेट का परीक्षण किया। पहले मीडिया में दावा किया गया था कि यह दवा 90 फीसदी तक खतरे को कम कर देती है। यूके की प्राउड स्टडी और फ्रांस की एक स्टडी में भी एड्स होने के खतरे को 80 फीसदी तक कम करने की बात कही गई है।

4- रोबायोटिक ड्रिंकेबल वैक्सीन :यह मरीजों के शरीर में फैल चुके एचआईवी वायरस को खत्म करने के बजाय इग्नोर करती है। एचआईवी का मुख्य काम इम्यून सिस्टम से रिएक्ट कर सीडी4 सेल्स को एक्टिवेट करना है। इसके बाद वायरस इन्हें इंफेक्ट करते हैं। इस प्रोबायोटिक ड्रिंकेबल वैक्सीन के कारण सीडी4 सेल्स एक्टीवेट होने के बावजूद भी बाहरी इंफेक्शन्स से रिएक्ट नहीं कर पाते हैं।



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world aids day 2018 theme and gene editing research to prevent aids

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डिशेज में गार्निशिंग से खाने तक फूलों का हो रहा इस्तेमाल, ये स्वाद में इजाफा करके डिप्रेशन घटाते हैं


लाइफस्टाइल डेस्क. फूलों का इस्तेमाल अब खुशबू और सजावट के लिए नहीं बल्कि डिशेज में भी पर भी किया जा रहा है। गार्निशिंग से लेकर खानपान में फ्लेवर देने तक फूलों की अलग-अलग वैरायटी का प्रयोग किया जा रहा है। इनकी खुशबू और न्यूट्रिएंट्स डिप्रेशन को कम करने के साथ शरीर में पोषक तत्वों की कमी भी पूरी कर रही है। लाइफस्टाइल न्यूट्रीशनिस्ट तृप्ति गुप्ता बता रही हैं इनके बारे में...

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1. मैरीगोल्ड : सैलेड ड्रेसिंग और फ्लेवर में होता है इस्तेमाल
मैरीगोल्ड को पेस्ट रेपेलेंट की तरह देखा जाता था लेकिन अब इसका इस्तेमाल खाने में हो रहा है। सौंधा और हल्का कड़वा फ्लेवर स्वाद बढ़ाता है। इसे सैलेड ड्रेसिंग के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिससे सलाद को फ्लेवर और कलर मिलता है। पत्तियां चाय में भी डाली जाती हैं।

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2. बनाना फ्लॉवर : आयरन और फायबर से भरपूर
केरल में बेहद मशहूर है। यह केले का माइल्ड वर्जन है, जो आयरन और फाइबर से भरपूर होता है। दिखने में ये मुश्किल लगता है, हर फूल को सावधानी से छीलना पड़ता है। मलाबार क्युजीन में इसे नारियल तेल में तलकर, मसाले डालकर परोसा जाता है। यह बेहद स्वादिष्ट और सेहतमंद डिश होती है।

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3. कैमोमिल : सर्दी-जुकाम और बेचैनी दूर करता है
इस फूल को "वॉटर ऑफ यूथ' भी कहा जाता है। फूलों को सुखाकर उन्हें उबलते पानी में डालकर चाय बनाई जाती है। शोध साबित करते हैं कि कैमोमिल से एंग्जाइटी दूर होती है। इसका हर्बल फ्लेवर सर्दी-जुकाम में भी बहुत फायदा पहुंचाता है।

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4. मोरिंगा : तनाव से राहत देता है
मोरिंगा के फूल बेहद स्वादिष्ट और पौष्टिक होते हैं। ये कई डिशेज में डाले जाते हैं। चाय में उपयोग किया जाता है, चटनी बनती है और क्रिस्पी स्नैक की तरह तलकर भी खाया जाता है। इनमें पोटैशियम और कैल्शियम पाया जाता है। ये तनाव से भी राहत देते हैं।

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5. मिंट : थकान और डिप्रेशन से बचाता है
मिंट के फूलों में भी हल्का मिंटी फ्लेवर होता है। इनसे कस्टर्ड गार्निश किया जाता है। आइस टी और लेमनेड में भी दिखते हैं। इन्हें खाने से थकान, डिप्रेशन नहीं होता। पाचन शक्ति भी बढ़ती है। ये किसी भी डिश को फ्लेवर और स्पाइस देते हैं।



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edible flower chef uses different flower in dishes to garnish & nutritious

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रक्तदान से नहीं होती कमजोरी, यह सिर्फ एक भ्रांति है


विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार भारत में सालाना एक करोड़ यूनिट रक्त की जरूरत होती है। लेकिन करीब 75 प्रतिशत रक्त ही उपलब्ध हो पाता है, जिसके कारण लगभग 25 लाख यूनिट खून के अभाव में हर साल सैकड़ों मरीज़ों की जान चली जाती है।
सवा अरब आबादी वाले भारत देश में रक्तदाताओं का आंकड़ा कुल आबादी का एक प्रतिशत भी नहीं है, जिसका एक बड़ा कारण है रक्तदान से जुड़ी जागरुकता का ना होना।

जानिए रक्तदान से जुड़े कुछ सवालों के जवाब...

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1. स्वैच्छिक रक्तदान क्या है? और इसे प्रधानता क्यों दी जाती है?

व्यक्ति जब अपनी इच्छा से बिना किसी आर्थिक लाभ के रक्त देता है तो उसे स्वैच्छिक रक्तदान कहते हैं। सामान्यतः स्वैच्छिक रक्तदान से प्राप्त रक्त अनेक संक्रमणों जैसे हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी, मलेरिया, सिफलिस एवं एच.आई.वी. /एड्स से मुक्त होता है। व्यवसायिक रक्तदाता जो केवल धन कमाने की इच्छा रखते हैं, यौन रोग, हेपेटाइटिस तथा एड्स जैसे संक्रामक रोगों से ग्रसित हो सकते है एवं रक्त प्राप्त करने वाले व्यक्ति को भी संक्रमित कर सकते हैं।

2.क्या मानव रक्त का कोई विकल्प है?

कृत्रिम रक्त बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं पर अभी तक इसका कोई कारगर विकल्प नहीं मिला। है। रक्तदान ही एकमात्र उपाय है।

3. रक्तदान कौन कर सकता है?

कोई भी स्वस्थ व्यक्ति जिसकी उम्र 18 से 65 वर्ष के बीच हो, वज़न 45 किलोग्राम या अधिक हो तथा हीमोग्लोबिन कम से कम 12.5 ग्राम प्रति डेसीलीटर हो, रक्तदान कर सकता है।

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4. मुझे रक्तदान क्यों करना चाहिए? और इससे मुझे क्या लाभ होगा?

मानव जीवन की रक्षा के लिए हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है कि उन लोगों की मदद करें, जिन्हें रक्त की आवश्यकता है।
रक्तदान करने से आपको चार लाभ होंगे।
1. आपको किसी का जीवन बचाने पर आत्मसंतोष होता है।
2. रक्तदान करने से आपके शरीर में नया रक्त बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
3. शोध से पता चलता है कि रक्तदान करने से रक्तदाता के शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा नियंत्रित होती है और ह्रदय रोग की संभावना कम हो जाती है।
4. आवश्यकता होने पर आपको स्वयं के लिए या आपके परिवार के किसी सदस्य के लिए रक्तकोष से रक्त लेने में प्राथमिकता दी जाएगी।

दान किया गया रक्त किसके काम आता है?

- दुर्घटना के शिकार लोगों के जीवन की रक्षा के लिए।

- शल्य चिकित्सा के समय ।

- खून की कमी या ‘एनीमिया' के मरीज़ों के लिए।

- शिशु के जन्म के समय आवश्यकता पड़ने पर गर्भवती माताओं के लिए।

- आर.एच.निगेटिव माताओं के शिशुओं की जीवन रक्षा के लिए।

- कैंसर, थैलिसीमिया आदि के मरीजों के लिए।

5. मैं रक्तदान कहाँ कर सकता हूँ? और इसमें कितना समय लगता है?

आप लायसेंसीकृत सरकारी अस्पताल के रक्तकोष अथवा रेडक्रास सोसायटी के रक्तकोष में रक्तदान कर सकते हैं। रक्तदान में सिर्फ 5 मिनट का समय लगता है। रक्तदान केन्द्र में पंजीकरण से अल्पाहार करने तक कुल आधे घण्टे का समय लग सकता है।


6. क्या रक्तदान के बाद विश्राम या विशेष भोजन की आवश्यकता होती है?

रक्तदान के बाद केन्द्र में व्यतीत किया गया मात्र आधे घण्टे का समय पर्याप्त है तथा रक्तदान के उपरांत विशेष भोजन की कोई आवश्यकता नहीं होती है। रक्तदाता रक्तदान के बाद सामान्य दिनचर्या जारी रख सकते हैं।

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7. दान किये गये रक्त की प्रतिपूर्ति में कितना समय लगता है?

रक्तदाता से एक बार में 300 से 400 मि.ली. रक्त लिया जाता है जो शरीर में उपलब्ध रक्त का लगभग 15 वां भाग होता है। शरीर में रक्तदान के तत्काल बाद दान किये गये रक्त की प्रतिपूर्ति करने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है तथा लगभग 24 घंटे में दान किये गये रक्त की प्रतिपूर्ति हो जाती है। शरीर में प्रवाहित होने वाले रक्त का आयतन रक्तदान से अप्रभावित रहता है क्योंकि रक्तदान में दिये गये रक्त के स्थान पर शरीर में संग्रहित रक्त तत्काल आ जाता है।

8. कोई भी व्यक्ति कितने अंतराल के बाद दुबारा रक्तदान कर सकता है?

कोई भी व्यक्ति 3 माह के अंतराल से रक्तदान कर सकता है। ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो अपने जीवनकाल में 50 से 100 बार तक रक्तदान कर चुके हैं।

9. यह कैसे जाना जा सकता है कि कोई व्यक्ति रक्तदान करने के योग्य है या नही?

रक्तदान के पहले चिकित्सक स्वास्थ्य परीक्षण करता है। इस परीक्षण से जाना जा सकता है कि व्यक्ति रक्तदान के योग्य है या नहीं।



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blood donation related myths and truth behind them

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दुरुस्त हो रही है ओजोन परत, अंटार्कटिका पर आईआईटी खड़गपुर की रिसर्च में पुष्टि


हेल्थ डेस्क. सूर्यकी हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट (परबैंगनी) रेडिएशन से बचाने वाली ओजोन की परत में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। यह धीरे-धीरे खुद को रिपेयर कर रही है। दुनिया के आधे उत्तरी हिस्से में ओजोन की पर्त 2030 तक खुद को रिपेयर कर लेगी। यह रिपोर्ट अमेरिका ने जारी की है। खास बात है कि अंटार्कटिका पर ओजोन परत सबसे ज्यादा खतरनाक स्थिति में थी यहां पर भी सुधार देखा जा रहा है। आईआईटी खड़गपुर ने भी अपनी हालिया रिसर्च में इसकी पुष्टि की है। रिपोर्ट के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने 1979 से लेकर 2017 तक के आंकड़ों का अध्ययन किया। इसमें सामने आया कि अंटार्कटिका पर मौजूद ओजोन परत में 1987 में सबसे ज्यादा नुकसान देखा गया था। 2001 से 2017 तक परतमें नुकसान का स्तर कम हुआ है। रिसर्च के मुताबिक परिणामों में अलग-अलग मौसम का डाटा शामिल किया गया है।

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नासा वैज्ञानिक पॉल न्यूमैन के मुताबिक,अगर ओजोन लेयर को नुकसान पहुंचाने वाले तत्व बढ़ते रहे तो इसके खतरनाक नतीजे होंगे।नासा कीमुताबिक, धरती से 7-25 मील ऊपरओजोन परत है। यह पृथ्वी पर आने वाली सूर्य की नुकसान पहुंचाने वाली पराबैंगनी किरणों को रोकने का काम करती है। जो स्किन कैंसर, मोतियाबिंद का कारण बनने के साथ शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता और पौधों को नुकसान पहुंचाती हैं। वायुमंडल की ऊपरी सतह कुदरती तौर पर बनी ओजोन की परत को अच्छा माना जाता है।

सफल रहा 196 देशों का मॉन्ट्रियल प्रोटोकाल
वैज्ञानिकों ने 1970 में पहली बार ओजाेन की पतली होती परत की पहचान की थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि इसका कारण रेफ्रिजरेटर और स्प्रे में मौजूद क्लोरोफ्लोरो कार्बन है।ओजोन लेयर में लगातार क्षति देखते हुए 1980 में 196 देशों ने मिलकर एक मसौदा तैयार किया। इसे मॉन्ट्रियल प्रोटोकाल कहा गया। जिसका मकसद दुनियाभर में क्लोरोफ्लोरो कार्बन का स्तर कम करना था। कई कंपनियों ने क्लोरोफ्लोरो कार्बन फ्री प्रोडक्ट बनाएऔर यह प्रयोग काफी कामयाबरहा।

यूनाइटेड नेशन एन्वायरमेंटप्रोग्राम के प्रमुख एरिक सोल्हिम के अनुसार, करीब 30 साल इस प्रोटोकॉल के कारण ओजोन परतसे जुड़े सकारात्मक परिणाम सामने आए। पर्यावरण का तापमान बढ़ाने वाली गैसें जिसे हाइड्रोफ्लोरोकार्बन के नाम से भी जाना जाता है, उन्हें भी कम करने की पहल की गई थी। ये गैसें रेफ्रिजरेटर, एयरकंडीशनर और कारों में पाई जाती हैं।





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Antarctic ozone hole is healing IIT Kharagpur study reveals

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डीएनए की मदद से पहली बार खोजी गई मधुमक्खी की ऐसी प्रजाति जिसके दो पिता हैं, पर मां नहीं


साइंस डेस्क. वैज्ञानिकों ने ऐसी मधुमक्खी की खोज की है जिसके दो पिता हैं और कोई मां नहीं है।सिडनी यूनिवर्सिर्टी कीशोधकर्ता साराआमीडोर और उनकी टीम के मुताबिक,मधुमक्खियों में प्रजनन के प्रकार पर अध्ययन के दौरान इस खास किस्म कीखोज हुई। यह पहली रिपोर्ट है जिसमें किसी मधुमक्खी के दो पिता पाए गए। सारा कहती हैं कि मधुमक्खियों में ऐसा इसलिए संभव है क्योंकि इनमें प्रजनन के कई तरीके है, पर इंसानों में ऐसा होना संभव नहीं है।


दो नर मधुमक्खियों के स्पर्म से ऐसा हुआ
रॉयल सोसायटी बायोलॉजी लेटर्स जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने गाइएंड्रोमॉर्फ प्रजाति की11 मधुमक्खियों की जनन प्रकिया की पड़ताल की। प्रत्येक मधुमक्खियों के अलग-अलग हिस्सों और ऊतकों का अध्ययन किया। शोध में प्रत्येक मक्खी के दो से तीन पिता और एक मां की बात सामने आई। इसी दौरान एक मक्खी ऐसी भी सामने आई जिसके दो पिता है और मां नहीं। इस खास मक्खी में मां से मिलने वाला जेनेटिक मटेरियल नहीं पाया गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह मधुमक्खीदो नर मधुमक्खी के स्पर्म से मिलकर बनी है।


कई तरीकों से होता है मधुमक्खियों में प्रजनन
मधुमक्खियों में जेनेटिक सिस्टम हेप्लोडिप्लॉयड है। इसमें निषेचित अंडे से मादा और गैरनिषेचित अंडे नर मधुमक्खी पैदा होती है। 98% मामलों में ऐसा ही होता है लेकिन 1-2%मामलों में इनका जन्म दूसरी तरह से होता है। इस प्रकिया को सेक्स मोजेक्स कहते हैं। मधुक्खियों की इस प्रजाति को गाइएंड्रोमॉर्फ कहते हैं। ऐसी मधुमक्खियों में नर और मादा के 50-50%लक्षण देखने को मिलते हैं। शोधकर्ता के मुताबिक ऐसे मामले जीन के बदलाव के कारण होते हैं। लेकिन ऐसा क्यों होता है इसका अब तक पता नहीं चल सका है।

इंसान vs मधुमक्खी
इंसानों में अंडाणु और स्पर्म मिलकर निषेचन करते हैं। इस दौरान एक रासायनिक प्रक्रिया होती है जिसमें अंडाणु में केवल एक स्पर्म को एंट्री मिलती है। हालांकि मधुमक्खियों में एक से ज्यादा स्पर्म की एंट्री हो सकती है। इसे पॉलीस्पर्मी कहते हैं। ऐसा गाइएंड्रोमॉर्फ प्रजाति के मामलों में होता है। अंडाणु में एक से अधिक स्पर्म की एंट्री होती और कोशिकाओं का गुच्छा सा बन जाता है। इसके बाद ये छोटे-छोटे हिस्सों में टूटना शुरू हो जाते हैं और भ्रूण में विकसित होने लगते हैं।



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Scientists discover a bee with two fathers and no mother

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टॉयलेट सीट बताएगी कहीं आपको डायबिटीज तो नहीं, अंतरिक्ष में भी होती है इस्तेमाल


हेल्थ डेस्क. वैज्ञानिकों ने ऐसी हाईटेक टॉयलेट सीट बनाई है जो डायबिटीज और कैंसर का पता लगाने में मदद कर सकती है। लक्षण दिखने पर अलर्ट भी कर सकती है। फिटलू नाम की इस स्मार्ट टॉयलेट सीट को यूरोपियन स्पेस एजेंसी और मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने मिलकर तैयार किया है। इसे मोबाइल से जोड़ा गया है। टॉयलेट में लगे सेंसर यूरिन की मदद से बीमारी का पता लगाते हैं। यूरिन में प्रोटीन और ग्लूकोज की मात्रा मानक से अधिक मिलने पर सेंसर मोबाइल फोन पर अलर्ट भेज देते हैं।

टॉयलेट सीट बनाने के लिए कंपनी की तलाश
अभी एस्ट्रोनॉट इस तकनीक का इस्तेमाल स्पेसक्राफ्ट में करते हैं, जिसे यूरिन मॉनिटरिंग सिस्टम के नाम से जाना जाता है। यह जल्द ही आम लोगों के लिए उपलब्ध हो सकेगी। यूरोपियन स्पेस एजेंसी और मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी फिलहाल ऐसी कंपनी को तलाश रहे हैं जो इस तकनीक का इस्तेमाल करके टॉयलेट सीट तैयार कर सके।

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इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में इस मॉनिटरिंग सिस्टम की मदद से यूरिन कलेक्शनकिया जाता है।

यूरोपियन स्पेस एजेंसी के सैनिटेशन प्रोजेक्ट मैनेजर डेविड कोप्पोला के मुताबिक, हम स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए डेटा और स्पेस टेक्नोलॉजी में संभावनाएं ढूंढ रहे हैं। प्रोजेक्ट के प्रमुख माइकल बताते हैं कि शरीर में क्या बदलाव होते हैं, ज्यादातर लोग इस पर ध्यान नहीं देते लेकिन अब फिटलू इस पर नजर रखेगा। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ज्यादातर स्वास्थ्य समस्याओं को यूरिन टेस्ट की मदद से जाना जा सकता है।

अगर आपके पास 1 हजार स्मार्ट टॉयलेट हैं तो एक बड़े क्षेत्र में लोगों के स्वास्थ्य पर नजर रखी जा सकती है। तकनीक में प्रोगाम किए गए डेटा की मदद से बीमारियों के फैलने के खतरे का भी पता लगाया जा सकता है।

डेविड कोप्पोला, सैनिटेशन प्रोजेक्ट मैनेजर

स्मार्ट टॉयलेट के मामले जापान सबसे आगे
जापान में स्मार्ट टॉयलेट अासानी से देखे जा सकते हैं। यहां के लोग सफाई पर अधिक ध्यान देते हैं इसलिए जापानी टॉयलेट में सफाई के लिए गर्म पानी, एयर ड्रायर और गर्म सीट्स का प्रयोग किया जाता है। कुछ जापानी टॉयलेट मैन्यूफैक्चर कंपनियां ऐसे टॉयलेट बना रही हैं जो वाई-फाई से जुड़े रहते हैं। ये बॉडी मास इंडेक्स, प्रोटीन-शुगर का लेवल और यूरिन के तापमान पर भी नजर रखते हैं।

यूरिन टेस्ट क्यों है जरूरी
यूरिन टेस्ट की मदद से ब्लैडर कैंसर, किडनी और लिवर से जुड़ी बीमारियों के अलावा संक्रमण का पता भी लगाया जा सकता है।



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FitLoo toilet will track changes in urine and detect cancer and diabetes

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सूरज की रोशनी से शुद्ध किया जा सकेगा प्रदूषित पानी, जर्मनी के वैज्ञानिकों का दावा


हेल्थडेस्क. प्रदूषित पानी को सूरज की रोशनी क मदद से साफ किया जा सकता है। जर्मनी के मार्टिन लूथर विश्वविद्यालय (एमएलयू) के शोधकत्ताओं यह दावा किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, पानी में घुले हुए प्रदूषकों को हटाने हाइड्रेटेड इलेक्ट्रॉन्स का उपयोग करके इसे शुद्ध किया जा सकता है। इसकी मदद से सूरज की रोशनी का इस्तेमाल करते हुए पानी में मौजूद प्रदूषकों को हटाया जा सकता है।

हाइड्रेटेड इलेक्ट्रॉन्स सख्त प्रदूषकों को तोड़ने में सक्षम
एमएलयू में प्रोफेसर मार्टिन गोएज के अनुसार, ये इलेक्ट्रॉन काफी प्रतिक्रियाशील हैं और प्रतिक्रिया के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। ये सख्त प्रदूषकों को भी तोड़ने में सक्षम हैं। इसके लिए इलेक्ट्रॉन को आण्विक यौगिकों से छोड़ना पड़ता है जहां इन्हें पूरी तरह से बंद रखा जाता है। ऐसे इलेक्ट्रॉन को पैदा करना बहुत जटिल और खर्चीला होता है।

ऐसे साफ होगा पानी
शोधकत्ताओं ने नई प्रक्रिया विकसित की है जिसमें ऊर्जा के एकमात्र स्रोत के रूप में ग्रीन लाइट एमिटिंग डायोड की जरूरत होती है। प्रतिक्रिया के लिए उत्प्ररेक के तौर पर विटामिन-सी और धातु मिश्रण का इस्तेमाल किया जाता है। जांच से पता चला कि हाइड्रेटेड इलेक्ट्रॉन पैदा करने का यह सक्षम तरीका है और साथ ही इसके और भी उपयोग हो सकते हैं। शोधकर्मियों ने नए तरीके का इस्तेमाल प्रदूषित पानी पर किया। छोटे सैंपल में इस विधि से पानी के प्रदूषकों को हटाने में सहायता मिली।



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polluted water can be purify by sun light says german researchers

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भूलने की आदत है तो करें न्यूरोबिक्स, दिमागी कसरत बढ़ाती चीजों को याद रखने की क्षमता


हेल्थ डेस्क. ‘बूढ़े हो गए हैं, सो याद नहीं रहता’ यह जुमला बुज़ुर्ग आमतौर पर कहते सुने जाते हैं। अब इसकी तीव्रता बढ़कर रोग हो गई है। इससे मुकाबला ज़रूरी है। और ज़्यादा मुश्किल भी नहीं है। बस न्यूरोबिक्स कीजिए।

क्या है न्यूरोबिक्स
न्यूरोबिक्स में कुछ खास गतिविधियों को शामिल करने के लिए कहा जाता है। जैसे...

  • अगर सीधे हाथ से काम करते हैं, तो दिन के दो-चार काम, रोज़ उल्टे हाथ से करें। बायां हाथ इस्तेमाल करते हों, तो सीधे से काम करें। ब्रेन साइंटिस्ट कहते हैं हाथों की अदला-बदली दिमाग़ के सेल कनेक्शंस और इनके संचार को बेहतर करती है।
  • लोगों के नामों को उल्टा बोलने का प्रयास करें। जैसे पूनम हो जाएगी मनपू, बबीता होगी ताबीब, मोहन होगा तहमो आदि। इसी तरह किताब या अखबार का कोई वाक्य या पैरा पूरी तरह उल्टे पढ़ने का प्रयास करें।
  • सामान्य गुणा-भाग करने के लिए कैल्कुलेटर की जगह काग़ज़-कलम की मदद लें।
  • गिनती की चुनौतियां लें। 1000 से उल्टा गिनें।9 13, 17, 18, 19 आदि के पहाड़े बोलें। इसके अलावा वर्ग पहेली और सुडोकू जैसी दिमागी कसरत करें।
  • इन सबमें से कम से कम तीन गतिविधियां रोज करें। अवधि कम से कम आधे घंटे की होनी चाहिए। हो सके तो नई भाषा सीखिए। लिखना-पढ़ना दोनों रूप में।

कब हो जाएं अलर्ट
भूलना सबसे बाद का चरण है। पहले आते हैं चिड़चिड़ापन, अटपटा व्यवहार, चीजों को लेकर असमंजस और रोज़मर्रा के सरल, सामान्य कामों को करने में कठिनाई। ऐसे में जरूरी है उन लक्षणों को समझना ताकि बीमारी को पहचाना जा सके। अलर्ट हो जाएं जब…

  • महत्वपूर्ण बातों या काम को याद रखने में अक्सर मुश्किल पेश आने लगे।
  • बातचीत के दौरान बार-बार बातों को दोहराएं।
  • निर्णय करने में दिक़्क़त, पैसों को गिनने, सम्भालने में समस्या।
  • दिन की गतिविधियों को याद रखने में मुश्किल।
  • बार-बार सवाल दोहराएं।
  • उन रास्तों पर भी भटक जाएं, जिनसे अब तक अच्छी तरह परिचित थे।
  • निर्देशों को समझने में मुश्किल।
  • समय तथा लोगों-स्थानों के नामों को लेकर असमंजस।
  • अपना ख़्याल रखने में अजीब-सी लापरवाही जैसे कपड़े न बदलना, ठीक से न खाना या सड़क पर चलते हुए अपनी सुरक्षा भूल जाना।


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neurobics brain exercise can sharpen your memory in case of dementia

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सर्दी में धूल-धुएं की एलर्जी-अस्थमा से बचाएंगे देसी नुस्खे, डाइट में लें गुड़, तुलसी और त्रिफला


हेल्थ डेस्क. आमतौर पर सर्दी के दिनों में हर शहर और कस्बे में धुएं और धूल की समस्या बढ़ जाती है। राजधानी दिल्ली और बड़े शहर पहले से ही वायु प्रदूषण से जूझ रहे हैं। इससे खासकर अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, साइनस और सीजनल एलर्जी से ग्रस्त लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में इस मौसम में हमें अपनी डाइट में कुछ ऐसी चीजें जरूर शामिल करनी चाहिए जो हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाएं और फेफड़ों को डिटॉक्स कर श्वास नली को साफ रख सकें। डाइट एंड वेलनेस एक्सपर्ट डॉ. शिखा शर्मा से जानते हैं ऐसी ही 5 चीजों के बारे में...

  1. गुड़ : इसमें एंटी एजर्लिक प्रॉपर्टी होती है जिस वजह से यह सांस संबंधी समस्याओं के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है। यह जिंक और सेलेनियम जैसे एंटी ऑक्सीडेंट्स और मिनरल्स से युक्त होता है। ये मिनरल्स संक्रमण के खिलाफ शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम करते हैं। अस्थमा के मरीजों को खासकर ठंड के दिनों में शरीर में आंतरिक गर्मी की जरूरत पड़ती है। गुड़ यह काम आसानी से करता है। इसलिए अस्थमा के मरीजों को दिन में गुड़ की एक ढेली जरूर खानी चाहिए।
  2. गाय का घी : श्वास नली से प्रदूषक तत्वों को दूर करने में गाय का घी काफी फायदेमंद हो सकता है। इसकी बस दो बूंदें सुबह-शाम के समय नाक के दोनों छिद्रों में डालनी हैं। इसके अलावा अगर दिनभर में दो से तीन चम्मच घी का सेवन भी कर लिया जाए तो इससे हडि्डयों, किडनी और लिवर में एकत्रित होने वाले पारा और सीसा जैसे तत्व दूर हो सकेंगे। घी का सेवन रोटी, चावल या दाल किसी में भी किया जा सकता है।
  3. तुलसी : अदरक-शहद के साथ तुलसी का काढ़ा अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, इन्फ्लूएंजा और सर्दी-खांसी में काफी असरकारक होता है। यह काढ़ा बनाने के लिए आधे लीटर पानी में तुलसी के पत्तों और अदरक को तब तक उबालिए, जब तक कि पानी आधा न रह जाए। अब उसे गुनगुना कर उसमें एक या दो चम्मच शहद मिलाकर दिन में दो से तीन बार सेवन कीजिए। अगर काढ़ा ठंडा हो गया हो तो उसे हल्का गुनगुना कर ही लेना चाहिए।
  4. पिपली : फेफड़ों को डिटॉक्स करने यानी फेफड़ों को प्रदूषणकारी जहरीले तत्वों से मुक्त करने में पिपली काफी मददगार हो सकती है। यह हमारी सांस नली से बलगम को हटाती है जो खासकर वायु प्रदूषण वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए काफी फायदेमंद है। रोजाना रात को सोने से पहले 1/4 टी स्पून हल्दी, 1/4 टी स्पून सोंठ पाउडर के साथ 1/8 टी स्पून पिपली मिला लें। इसे एक चम्मच शहद के साथ गुनगुने पानी में मिलाकर लें।
  5. त्रिफला : प्रदूषण के कारण 'त्रिदोष' (वात, पित्त और कफ) में असंतुलन होता है। यह इस असंतुलन को दूर करने में मददगार होता है। रोजाना रात को सोने से पहले गुनगुने पानी के साथ एक चम्मच त्रिफला चूर्ण लेना चाहिए। इससे श्वास संबंधी दिक्कतें कम होंगी।


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home remedies to curb allergy and asthma in winter

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बुखार में देसी चूर्ण और काढ़ा तेजी से घटाते हैं शरीर का तापमान


हेल्थ डेस्क. बुखार कभी भी और किसी को भी हो सकता है। ऐसे लोग जिनकी रोग से लड़ने की क्षमता ज्यादा होती है उनमें संक्रमण का खतरा कम रहा है। बुखार जाने में आमतौर पर तीन से चार दिन का समय लेता ही है। बुखार आते ही कई लोग तुरंत डॉक्टर के पास चले जाते हैं। बुखार हमारे शरीर की रक्षा के लिए आता है, क्योंकि शरीर का तापमान बढ़ने से बैक्टीरिया और वायरस की ग्रोथ कम हो जाती है। लेकिन यह भी ध्यान रखें कि इस दौरान अगर शरीर का तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाए तो यह घातक हो सकता है। इसलिए इसे नियंत्रित करना भी ज़रूरी है। बुखार आने पर तापमान को 100°F से कम रखना आवश्यक है, लेकिन जरूरी नहीं है कि इसे हम पेरासिटेमॉल से ही नियंत्रित करें। आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. अबरार मुल्तानी से जानते हैं बुखार दूर करने के आयुर्वेदिक उपाय...

चूर्ण और काढ़ा बढ़ाता है रोगों से लड़ने की क्षमता
वैकल्पिक चिकित्सा के रूप में सामान्य बुखार को कम करने या दूर करने के कई अच्छे उपाय आयुर्वेद के पास हैं। चूर्ण की मदद से भी इसे दूर किया जा सकता है। इसके लिए पांच तरह के चूर्ण - पिपली चूर्ण, कुटकी चूर्ण, कंटकारी चूर्ण, पुष्कर मूल चूर्ण और तुलसी के पत्तों के चूर्ण को दो-दो चम्मच लेकर मिक्स कर लीजिए। यह सभी चूर्ण आसानी से पंसारी या जड़ी-बूटी विक्रेता के यहां मिल जाएंगे। इस पाउडर को एक डिब्बी में रख लें। अब इसे सुबह, दोपहर और शाम को आधा-आधा चम्मच लेकर शहद मिलाकर खाएं। बुखार चले जाने तक इस डोज को दिन में 3 बार लेना है। यह पाउडर बनाकर छह महीने तक रखा जा सकता है। अगर ज्यादा पाउडर बनाना है तो यहां दी गई मात्रा बढ़ा दीजिए।
अगर आपको यह नुस्खा कठिन लग रहा है तो एक आसान नुस्खा भी है। इसके लिए महासुदर्शन काढ़ा और दशमूल काढ़ा लाना है जो आसानी से हर आयुर्वेद की दुकान पर उपलब्ध है। इन दोनों को 10-10 मिली की समान मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम लेना है।

पहचानें कौन-सा बुखार हुआ है?

  • मलेरिया : बुखार सर्दी या कंपकपी लगकर आता है। एक, दो या तीन दिन के अंतराल से आता है। बुखार तेज पसीना लाकर उतरता है।
  • डेंगू : तेज बुखार के साथ सिर में तेज दर्द, आंखों में दर्द, बदन दर्द, शरीर पर लाल चकत्ते बनना (4 से 5 दिनों बाद)।
  • टायफॉइड : तेज़ बुखार जो रोज़ाना और तेज़ होता जाता है। भूख की कमी, उल्टी, दस्त, शरीर पर लाल रंग के दाने (कभी-कभी नहीं भी आते), जीभ पर वी शेप की सफेद कोटिंग।
  • वायरल फीवर : सर्दी, खांसी, ज़ुकाम, बदन दर्द के साथ बुखार।
  • चिकनगुनिया : जोड़ों में तेज़ दर्द के साथ बुखार।
  • टीबी: शाम को रोज़ाना बुखार आता है।


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Ayurveda medicine to combat fever by abrar multani

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मुगल बावर्चियों ने कश्मीर में पहली बार बनाई थी ईरानी डिश रोगनजोश


लाइफस्टाइल डेस्क. मुगलों को हम अक्सर उनके जंग के तरीकों और कला-संस्कृति एवं वास्तुकला में उनके योगदान और उनसे जुड़े कई ऐतिहासिक किस्सों के लिए जानते हैं। लेकिन खान-पान के इतिहासकारों से पूछेंगे तो वे मुगलों की एक और खासियत से आपको रूबरू करवाएंगे। यह है पाककला में उनकी रुचि। हमारे देश में कई पर्शियन (ईरानी) डिशेज को लाने का श्रेय मुगलों को ही जाता है। जब वे नई जगहों पर जाते थे, तो वहां के स्थानीय भोजन में अपना फ्लेवर मिलाकर एक नई डिश तैयार कर देते थे। कहा जाता है कि जब मुगल कहीं जाते थे तो उनके कारवां में 50 ऊंट और 200 लोग तो केवल खाने की सामग्री और बर्तन इत्यादि लेकर चलते थे। साथ ही करीब 50 गायें हर समय साथ होती थीं ताकि अच्छी गुणवत्ता का दूध, छाछ, दही, घी मिल सके। शेफ और फूड राइटर हरपाल सिंह सोखी से जानिए रोगनजोश की शुरुआत भारत में कैसे हुई...

मुगलों को कश्मीर घाटी काफी पसंद थी। खासकर गर्मियों के दिनों में तो वे अपना अधिकांश समय कश्मीर घाटी में ही बिताते थे। मुगल किचन का काफी असर कश्मीरी पाककला पर भी पड़ा। मुगलों के बावर्चियों का ही यह कमाल था कि घाटी में 'रोगनजोश' डिश ईजाद हो सकी। आज 'रोगनजोश' कश्मीरी कुजीन का प्रमुख हिस्सा है। किसी मेहमान के घर आने पर लंच या डिनर रोगनजोश के बगैर पूरा नहीं माना जाता। रोगनजोश मुख्यत: बकरी या भेड़ के मांस से बनाया जाता है।

रोगनजोश मूलत: ईरान की डिश है। पर्शियन में 'रोगन' का मतलब है बटर (घी) और 'जोश' का मतलब है धीमी आंच पर पकाना। यानी पूरा मतलब हुआ ऐसी डिश जो बटर में धीमी आंच पर पकाई गई हो। हालांकि ईरान से यहां आने पर इसे पकाने का तरीका बदल गया। कश्मीर में कई स्थानीय मसाले रोगनजोश में डाले जाने लगे। धर्म के अनुसार भी इसे पकाने का तरीका अलग हो गया। कश्मीरी मुस्लिम रोगनजोश में काफी मात्रा में प्याज, लहसुन, प्रान (प्याज जैसी ही एक स्थानीय सब्जी) के साथ-साथ कॉक्सकॉम्ब नामक फूल की सूखी पत्तियां डालते हैं। इन पत्तियों की वजह से रोगनजोश का रंग काफी लाल हो जाता है। इसमें काफी मात्रा में लाल मिर्च भी मिलाई जाती है। कश्मीरी हिंदू रोगनजोश में प्याज और लहसुन डालने से परहेज करते हैं। फ्लेवर देने के लिए वे इनकी जगह सौंफ और हींग डालते हैं। समय बदलने के साथ रोगनजोश में कई तरह के बदलाव आते गए।



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food history of rogan josh dist by chef harpal singh sokhi

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बढ़ रही है Male infertility, IVF है उपयोगी तकनीक


हर दंपत्ति अपने जीवन में संतान का सुख चाहता है लेकिन कई महिलाओं को प्राकृतिक रूप से गर्भ धारण करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। अगर 1 साल नियमित प्रयास करने पर भी गर्भधारण में सफलता नहीं मिले तो इसे इनफर्टिलिटी कहते हैं | आमतौर पर ये देखा गया है कि सोसाइटी में इनफर्टिलिटी को सिर्फ महिलाओं से जुड़ी समस्या समझा जाता है लेकिन निःसंतान दंपत्तियों में 30-40 % मामलों में पुरुष नि: संतानता की वजह हो सकते हैं।


जब पुरुष का स्पर्म काउंट कम हो या उसके स्पर्म एग को फर्टिलाइज करने के योग्य न हों तब उसे मेल इनफर्टिलिटी कहते हैं।


इन्दिरा आई वी एफ गोरखपुर सेण्टर की आई वी एफ स्पेशलिस्ट डॉ. शिखा मुखीजा का पुरुष बाँझपन के कारणों के बारे में बताते हुए कहती हैं किपुरुषों में 'इनफर्टिलिटी' के कुछ प्रमुख कारण:
• स्पर्म काउंट में कमी होना।
• असामान्य आकार होना जिसकी वजह से स्पर्म को आगे बढ्ने व एग को फर्टिलाइज़ करने में मुश्किल होती है।
• शुक्राणु का बनना लेकिन बाहर नहीं आ पाना |
• Hormone deficiency के चलते पुरुषों में Testosterone की मात्रा घट जाती है जिससे sperm count कम या nil यानि शून्य भी हो सकता है।
• Anemia, Thyroid व Diabetes जैसी बीमारियों से भी पुरुषों की fertility पर काफी असर पड़ता है।


इन सभी कारणों में सबसे मुख्य कारण कम स्पर्म काउंट को माना गया है तो आइये जनते हैं स्पर्म काउंट से जुड़ी कुछ जरूरी जानकारी और साथ ही अगर पुरुष में स्पर्म की मात्रा कम हो तो क्या हैं उसके इलाज़।

स्पर्म काउंट कम होना:
पुरुषों में स्पर्म की गुणवत्ता और उसकी मात्रा गर्भ धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है स्पर्म काउंट 15 मिलियन या इससे अधिक होना सामान्य माना जाता है लेकिन 15 मिलियन से कम होने पर स्पर्म काउंट असमान्य होने के श्रेणी में आता है।

आइए जानते हैं स्पर्म काउंट से जुड़ी कुछ बातें और इलाज़ भी:

• 10 से 15 मिलियन स्पर्म काउंट
• 10 से 15 मिलियन स्पर्म काउंट होने की स्थिति में आईयूआई (IUI)
• यानी इंट्रायूटेराइन इनसिमेनेशन प्रक्रिया कराई जाती है। इस प्रोसैस में महिला की ओव्यूलेशन साइकल को दवाओं के जरिये मेंटेन किया जाता है और एग मच्योर होने पर पुरुष के हेल्दी स्पर्म्स को छांट कर महिला के गर्भ में छोड़ दिया जाता है।
• 5 से 10 मिलियन स्पर्म काउंट

इन्दिरा आई वी एफ देहरादून सेण्टर की आई वी एफ स्पेशलिस्ट डॉ. सोनालिका चौधरी बताती हैं कि10 मिलियन से कम स्पर्म काउंट होने की स्थिति में डॉक्टर आईवीएफ IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक अपनाने की सलाह देते हैं, इस तकनीक में सबसे हेल्थी mature eggs व sperms को लैब के कंट्रोल्ड वातावरण में fertilize किया जाता है उसके बाद अच्छी गुणवत्ता के embryos यानी भ्रूण को महिला के गर्भ में प्रत्यारोपित किया जाता है ताकि वह सामान्य रूप से विकसित हो सके ।


• 1 से 5 मिलियन स्पर्म काउंट
• 1 से 5 मिलियन स्पर्म काउंट होने पर सबसे कारगर तकनीक, इंट्रासाइटोप्लाज्स्मिक स्पर्म इंजेक्शन यानी ICSI (आईसीएसआई), को माना जाता है। ये तकनीक स्पर्म की सहायता के लिए विकसित की गयी थी, जिससे स्पर्म को माइक्रोइजेक्शन सुई के उपयोग से एग के केंद्र में सीधे इंजेक्ट किया जाता है इससे प्रेग्नेंसी की सम्भावना अधिक हो जाती है । इक्सी से बहुत कम शुक्राणु होने पर भी पिता बनना संभव हो गया है |


शून्य स्पर्म काउंट
पुरुषों में स्पर्म काउंट शून्य होने पर टेस्टीक्ल्यूर बायोप्सी (TESE) की जाती है इस तकनीक में स्पर्म बनने वाली जगह से एक टुकड़ा ले कर लैब में टिशु की जांच की जाती है। उस टिशु में स्पर्म की उपस्थिती का पता लगाया जाता है। अगर टिश्यू में स्पर्म उपलब्ध होते हैं तो इक्सी (ICSI) प्रक्रिया को अपनाया जाता है और अगर स्पर्म नहीं मिलते तो स्पर्म डोनर की सहायता ली जाती है।


स्पर्म की गतिशीलता में कमी या मृत स्पर्म का होना:
स्पर्म की गतिशीलता में कमी होने की वजह से स्पर्म एग तक नहीं पहुंच पाता है जिस कारण से फर्टिलाइज़ेशन नहीं हो पाता। स्पर्म की गतिशीलता में कमी की अवस्था में इक्सी (ICSI) प्रक्रिया को अपनाया जाता है और अगर मृत स्पर्म हैं तो हाइपो ऑस्मोटिक स्वेलिंग तकनीक के माध्यम से जीवित स्पर्म का चयन किया जाता है उसके बाद इक्सी के माध्यम से आगे की प्रक्रिया को पूरा किया जाता है।

इन दिनों तकनीकी विस्तार से कम, निल या ख़राब शुक्राणुओं में भी पिता बना जा सकता है | एक वर्ष तक प्रयास के बाद भी गर्भधारण नहीं हो एसी स्थिति में विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श के बाद पति-पत्नी दोनों की जाँच करवानी चाहिए ताकि कारण का पता लगाकर उपचार आरम्भ किया जा सके |

निःसंतानता से जुड़ा आपका कोई भी सवाल है तो इन्दिरा आईवीएफ कि वेबसाइट विजिट करे, अपनी समस्या लिखें या एक्सपर्ट डॉ. से बात करने के लिए कॉल करें - 07230062727



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IVF is the most effective treatment for male infertility.

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मेंस ग्रूमिंग हब बना चंड़ीगढ़, पंजाब और हरियाणा, देश का करीब 23-27 फीसदी ग्रूमिंग मार्केट यहां


अजय दुबे @ लाइफस्टाइल डेस्क . देश का करीब 23-27 फीसदी ग्रूमिंग मार्केट सिर्फ सीपीएच यानी की चंड़ीगढ़, पंजाब और हरियाणा में है। यही वजह है कि ग्लोबल ब्रैंड डॉर्को ने चंडीगढ़ के एक स्टार्टअप लेट्सशेव में 10 फीसदी की हिस्सेदारी की है। एसोचैम की रिपोर्ट के अनुसार 25 से 45 वर्ष के भारतीय पुरुष, महिलाओं की अपेक्षा पर्सनल ग्रूमिंग पर दोगुना खर्च करते हैं। पिछले वर्षों के दौरान मेंस ग्रूमिंग का भारतीय बाजार 45 फीसदी की दर से बढ़ा है। वर्तमान में यह बाजार करीब 16,800 करोड़ रुपए का है, जिसके अगले तीन वर्षों के दौरान 35,000 करोड़ रुपए तक बढ़ जाने की पूरी संभावना है। मार्केट रिसर्च फर्म ‘नोवोनस’ के अनुसार देश में मेन्स ग्रूमिंग इंडस्ट्री दो हिस्सों ‘बाथ और शॉवर प्रोडक्ट जैसे कि हेयर केयर, स्किन केयर, डिओड्रेंट्स और शेविंग प्रोडक्ट’ में बंटी हुई है। अकेले शेविंग प्रोडक्ट्स की ही वर्तमान बाजार में 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है।

मेंस ग्रूमिंग के मामले में पंजाब के युवा सबसे आगे
हेयर स्टाइलिस्ट जावेद हबीब के मुताबिक न सिर्फ देश में बल्कि वैश्विक स्तर पर पुरुष सौंदर्य बाजार महिलाओं की अपेक्षा कई गुना ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। भारतीय युवा अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा ब्यूटी ट्रीटमेंट पर खर्च कर रहे हैं, जिसमें पुरुषों की तादात ज्यादा है। पंजाब में यह आंकड़ा ज्यादा है। लेट्सशेव के फाउंडर और सीईओ सिद्धार्थ एस ओबेरॉय खुद भी चंडीगढ़ से ही हैं। उन्होंने वर्ष 2015 में इस स्टार्टअप को शुरू किया। फिलहाल उनके पास देश के 4.5 लाख से ज्यादा ग्राहक हैं और यह आंकड़ा साल-दर-साल 45 फीसदी की दर से बढ़ता जा रहा है। 4 प्रोडक्ट से शुरू होने वाले इस स्टार्टअप के पास वर्तमान में 22 से ज्यादा उत्पाद हैं। सिद्धार्थ का कहना है कि वे इस आंकड़े को बढ़ाकर 40 तक ले जाना चाहते हैं। वहीं डॉर्को एक प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय ब्रैंड है, जो कि पिछले 60 वर्षों से दुनियाभर में अपनी जगह बनाए हुए है। कोरिया के इस ब्रैंड की पहुंच दुनियाभर के 130 से ज्यादा देशों में है।

हमने कंपनियों की मोनोपॉली को तोड़ने के लिए तीन साल पहले यह स्टार्टअप शुरू किया था। आज यह न सिर्फ देशभर में अपनी पहचान रखता है, बल्कि पंजाब की सबसे बड़ी कंपनी और स्टार्टअप के तौर पर अपनी जगह बना चुका है। भारतीयों की क्रय क्षमता और उत्पादों की गुणवत्ता को ग्लोबल कंपनियां भी समझ चुकी हैं, यही वजह है कि वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान रखने वाली कंपनी ने हमारे साथ हाथ मिलाया है।

सिद्धार्थ एस ओबेरॉय, फाउंडर एवं सीईओ, लेट्सशेव, चंडीगढ़

- भारत में निवेश करने के पीछे सबसे बड़ा कारण भारतीयों की ग्रूमिंग के प्रति बढ़ती दिलचस्पी है। लेट्सशेव पंजाब के रास्ते पूरे भारत में अपनी विश्वसनीय पैठ बना रहा है, यही वजह है कि हमने उसके साथ हाथ मिलाया है।

केन क्वेक, ग्लोबल डायरेक्टर,डॉर्को, दक्षिण कोरिया

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खर्च करने में नहीं रहे पीछे
भोजन और स्वास्थ्य के अलावा सौंदर्य सेवा एक ऐसा क्षेत्र है, जहां लोग आंखें मूंदकर खर्च करने को तैयार हैं। भारत में महिलाएं हर महीने पार्लर और मेकअप के लिए 2000 से 3000 रुपए तक खर्च करती हैं। वहीं पुरुषों का रुझान पिछले कुछ वर्षों में ब्यूटी और हेयर ट्रीटमेंट के प्रति काफी बढ़ा है। पिछले साल लेडीज कॉस्मेटिक क्रीम्स की बिक्री करीब 1808 करोड़ रुपए की रही, जबकि पुरुषों ने भी 279.7 करोड़ रुपए की खरीदी अपने नाम की है। महिलाओं के फेस वॉश में पिछले साल के मुकाबले 8.4 फीसदी तो पुरुषों के लिए 57.9 फीसदी वृद्धि रही। इसी तरह से डियोड्रंट में भी पुरुषों ने औरतों को 5.5 के मुकाबले 9.3 फीसदी से पछाड़ा।

कहने को मुंबई मायानगरी और दिल्ली राजधानी है, लेकिन देश का फैशन ही पंजाब से शुरू होता है। यहां के ज्यादातर परिवारों का कोई न कोई सदस्य एनआरआई है या विदेशों में रहा है। ऐसे में विदेशी फैशन पंजाब के रास्ते पूरे देश में पहुंचता है। देशभर में मेरे 24 राज्यों में 816 सेलून हैं। इसमें सबसे ज्यादा रेवेन्यु जनरेट करने वाला इलाका सीपीएच है।

जावेद हबीब, डायरेक्टर, जावेद हबीब हेयर एंड ब्यूटी स्टूडियाे लि.

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Chandigarh Punjab haryana become mens grooming hub
Chandigarh Punjab haryana become mens grooming hub

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चीनी वैज्ञानिक का दावा- लैब में जुड़वा बच्चे बनाए, फिर जीन में बदलाव किया ताकि एड्स से बचाव हो सके


हेल्थ डेस्क. चीनी वैज्ञानिक ही जियानकुई का दावा है कि उसने लैब में दुनिया का पहला ऐसा मानव तैयार किया है जिसके जीन में बदलाव किया गया है। वैज्ञानिक के अनुसार, उसनेजुड़वा बच्चियों के जन्म से पहले ही उनके जीन में बदलाव करने का लक्ष्य था उन्हें भविष्य में एचआईवी वायरस से बचाने के लिए तैयार करना। इन बच्चियों को लुलु और नाना नाम दिया गया है। वैज्ञानिक ही जियानकुई ने यह दावा हॉन्ग-कॉन्ग में आयोजित एक अंतराराष्ट्रीय सेमिनार में किया है। गौरतलब है कि, जीन एडिटिंग यूरोप समेत दुनिया के कई देशोमें प्रतिबंधित हैं और अमेरिका में इसके अनैतिक तरीका माना जाता है।जीन एडिटिंग में शामिल रहे डॉक्टर ही जियानकुई ने बताया कि- हमारे पास 7 ऐसे दंपती आए थे, जिनके कोई संतान नहीं थी। इन सभी के उपचार के दौरान हमने भ्रूणों के जीन्स बदले, जिसमें अभी तक एक मामले में हमें संतान के जन्म में सफलता मिली है।

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ऐसे किया पूरा एक्सपेरिमेंट

1- प्रयोग में ऐसे जोड़ों को शामिल किया गया जिनमें पुरुष एचआईवी संक्रमित थे और महिला सामान्य। ये पुरुष दवाओं के बल पर संक्रमण के खतरों को रोकने की कोशिश कर रहे थे। उनसे अपील की गई कि वे अपने होने वाले बच्चों को एचआईवी से बचा सकते हैं।


2- जोड़ों की रजामंदी के बाद उन्हें रिसर्च में शामिल किया गया। भ्रूण तैयार करने के लिए आईवीएफ तकनीक अपनाई गई। पुरुष के स्पर्म को पहले साफ करके सीमेन से अलग किया गया। एक सिंगल स्पर्म को महिला के अंडाणु के साथ निषेचित करकेलैब में भ्रूण तैयार किया गया। इसके बाद उसके जीन में बदलाव किया गया।


3- भ्रूण बनने के 3-5 दिन बाद उसकी कुछ कोशिकाएं हटाई गईं और जांच की गई। करीब 16-22 ऐसे भ्रूण विकसित किए गए जिनके जीन में बदलाव हुआ। इनमें से 11 भ्रूण को महिलाओं में प्रेग्नेंसी के लिए ट्रांसप्लांट किया गया। सफलतापूर्वक हुईं जुड़वा बच्चियों के जन्म से उनके लिए शोधकर्ताओं ने 6 बार प्रयास किए गए थे।


4- टेस्ट में पता चला कि कुछ जुड़वा बच्चों के दोनों जोड़ों में जीन एडिटिंग हो पाई थी और कुछ जोड़ों में से सिर्फ एक में ही ऐसा हो सका था। रिसर्च के मुताबिक जिन जुड़वा बच्चों में से सिर्फ एक में जीन एडिटिंग हुई है उनमें दूसरे बच्चे को एचआईवी का खतरा पूरी तरह से टला नहीं है। कई वैज्ञानिकों ने इसे जांच और पाया कि जीन एडिटिंग पूरी तरह से बीमारी से बचा पाएगी, ऐसा कहना मुश्किल है।

माइक्रोप्लेट में मौजूद भ्रूण।

माइक्रोप्लेट में मौजूद भ्रूण।

मेरा लक्ष्य आनुवांशिक बीमारियों को बच्चों में होने से रोकना नहीं था। कोशिश थी बच्चों में एड्स के वायरस एचआईवी से लड़ने की क्षमता पैदा की जा सके।

ही जियानकुई


एचआईवी संक्रमण फैलने में मदद करने वाले जीन की खोज की

चीनी शोधकर्ता जियानकुई के अनुसार वे कई सालों से चूहे, बंदरों और मानव भ्रूण में बदलाव करते चले आ रहे हैं। उन्होंने कहा, चीन में संक्रमण एक बेहद आम समस्या है इसलिए जीन में बदलाव करने के लिए इंसान का भ्रूण का चुना। जियानकुई ने ऐसे जीन (CCR5) को खोजा जो खास तरह का प्रोटीन बनाता है। इसकी मदद से एचआईवी वायरस का संक्रमण आसानी से फैलता है।

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विरोध में आए वैज्ञानिक

हॉन्ग-कॉन्ग में हुई कॉन्फ्रेंस में जियानकुई की बात सुनकर कई वैज्ञानिक आश्चर्यचकित हुए और इसकी निंदा की। उन्होंने इस प्रयोग पर संदेह भी जताया। उनके मुताबिक यह रिसर्च अब तक किसी जर्नल में प्रकाशित नहीं हुई है और नहीं इससे जुड़े लोग भी सामने आए हैं। इसका जवाब देते हुए जियानकुई ने कहा, इस प्रक्रिया में शामिल पेरेंट्स अपनी पहचान नहीं उजागर करना चाहते और न ही वह कहां रहते हैं और क्या करते हैं, इसकी जानकारी देना चाहते हैं। मैं इस प्रयोग को अपनी एक जिम्मेदारी के तौर पर आगे बढ़ाना चाहता हूं, अब यह सोसायटी पर निर्भर है कि वह इसका क्या करेगी। कैलिफोर्निया के स्क्रिप्स रिसर्च ट्रांसलेशनल इंस्टीट्यूट के हेड डॉ. एरिक टोपोल, हेड ने कहा, ऐसा करना बहुत जल्दबाजी होगी।

इंसानों पर होने वाला यह प्रयोग बेहद अनुचित है। इसे रोकने की जरूरत है।

डॉ. किरन मुसुनुरू, जीन एडिटिंग एक्सपर्ट, यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिल्वेनिया
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बदलाव एक से दूसरी पीढ़ी में जाएंगे

पिछले कुछ सालों में वैज्ञानिकों ने जीन में बदलाव करने के आसान तरीकों की खोज की है। जिसकी मदद से इंसान के डीएनए में बदलाव किय जाता है। CRISPR-cas9 की मदद से डीएनए में एडिटिंग यानी जीन में बदलाव किया जाता है। लेकिन अब ऐसा सिर्फ उन मामलों में किया गया है जब इंसान में जानलेवा बीमारी देखी जाती थी और ये बदलाव केवल उस इंसान तक ही सीमित रहते हैं। लेकिन स्पर्म, एम्ब्रियो और अंडाओं में बदलाव करना अलग बात है। ये बदलाव एक से दूसरी पीढ़ी में जाते हैं। रिसर्च के अलावा दूसरी जगह इनका प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी जाती है। चीन मानव क्लोनिंग को गैरकानूनी ठहराता है कि लेकिन जीन एडिटिंग को खासतौर पर गलत नहीं ठहराता।



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Chinese scientist develops gene edited babies to resist HIV infection

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2,353 लोगों ने 60 सेकंड तक प्लैंक एक्सरसाइज कर बनाया गिनीज रिकॉर्ड, शिल्पा ने दिया सुपरफिट होने का सबूत


हेल्थ डेस्क. शिल्पा शेट्टी (43) नेहाल ही में वे पुणे में हुए एक फिटनेस प्रोग्राम में 60 सेकंड में प्लैंक एक्सरसाइज का नया रिकॉर्ड बनाया। शिल्पा ने प्लैंकॉथन प्रोग्राम में 2,353 लोगों के साथ प्लैंक किया और नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। पहले ये रिकॉर्ड चीन के नाम था जहां 1,780 लोगों ने एकसाथ प्लैंक एक्सरसाइज की थी। अब नए रिकॉर्ड के साथ ग्लोबल फिटनेस मैप में इंडिया आगे निकल गया है। शिल्पा पहली एक्ट्रेस हैं जो फिटनेस के लिए अपनी पावर योगा डीवीडी लॉन्च कर चुकी हैं। शिल्पा के अनुसार तन और मन को फिट रखने के लिए योगा सबसे बेहतर तरीका है। जानिए शिल्पा का डाइट और फिटनेस रूटीन कैसा है, जो उन्हें इस उम्र में फिट रहने में मदद करता है...

वर्कआउट रुटीन : हफ्ते में 5 दिन योगा और स्ट्रेंथ-कार्डियो ट्रेनिंग

  • शिल्पा हर तरह की एक्सरसाइज करती हैं। जिसमें कार्डियो वर्कआउट से लेकर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और योगा भी शामिल है। वे सप्ताह में सिर्फ पांच दिन वर्कआउट करती हैं। इनमें से दो दिन योग, दो दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और एक दिन कार्डियो के लिए रिजर्व रहता है।
  • स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को उन्होंने दो भागों में बांटा हुआ है। एक अपर बॉडी वर्कआउट और दूसरा लोअर बॉडी वर्कआउट। स्ट्रेंथ ट्रेंनिग के दौरान बॉडी को शेप में रखने के लिएहल्के की बजाय भारी वजन उठाना पसंद करती हैं। इतना ही नहीं, तनाव कम करने के लिए वे योगा के बाद 10 मिनट का मेडिटेशन भी लेती हैं।

डाइट प्लान : दिन की शुरुआत आंवला और एलोवेरा जूस से

  • शिल्पा डाइट में रोज 1800 कैलोरी एनर्जी लेती हैं। दिन की शुरुआत आंवला और एलोवेरा जूस से होती है। वो लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला कार्बोहाइड्रेट लेना नहीं भूलती हैं। खाना पकाने में वे ऑलिव ऑयल का इस्तेमाल करती हैं।
  • शिल्पा को ज्यादातर नॉन वेजिटेरियन फूड पसंद है। योगा और व्यायाम के बाद शिल्पा प्रोटीन शेक लेना पसंद करती हैं। वे सप्ताह में छह दिन खाने पर नियंत्रण करती हैं और एक दिन बाहर रेस्त्रां का खाना खाती हैं।
  • खाने के दौरान वे स्नैक्स नहीं लेती हैं, क्योंकि उनका मानना है कि इससे कैलोरी की मात्रा में बढ़ोतरी होती है।

ऐसा है डाइट का डेली रूटीन :

  • ब्रेकफास्ट: 1 कटोरी दलिया और एक कप चाय
  • वर्कआउट के बाद: प्रोटीन शेक, 2 खजूर, 8 मुनक्के
  • लंच में: घी लगी एक रोटी(पांच अलग-अलग तरह के अनाज के आटे से बनी), चिकन, दाल, रिफाइंड तेल में बनी सब्जी
  • दोपहर के बाद: एक कप ग्रीन टी
  • शाम को: सोया मिल्क
  • रात में: सेब और सलाद


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india wins guinness world record for 60 second plankathon shilpa shetty inv
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चेहरे पर बिना निशान होगी विकृत जबड़ों की सर्जरी, एम्स में करा सकते हैं निशुल्क


हेल्थ डेस्क. चेहरे पर बिना कोई निशान आए खराब जबड़ों को खूबसूरत बनाए जाने की सर्जरी अब देशभर में हो सकेगी। इसके लिए एम्स नेपाल समेत देशभर के करीब 100 डॉक्टरों को ट्रेंड कर रहा है। उन्हें करेक्टिव जॉ सर्जरी की ट्रेनिंग दी जा रही है। डॉक्टरों के ट्रेंड हो जाने के बाद इस सर्जरी पर आने वाले खर्च में भी कमी आने की संभावना जताई जा रही है। एम्स में 10 साल से यह सर्जरी फ्री हो रही है। आमतौर पर सर्जरी का खर्च 2 से 5 लाख तक अस्पताल लेते हैं। डॉक्टरों की ट्रेनिंग शनिवार को शुरू हुई है और यह रविवार को खत्म हो जाएगी। इसमें थ्योरी से लेकर प्रैक्टिकल तक की जानकारी डॉक्टर्स को दी जा रही है।

यह एक-डेढ़ माह की प्रक्रिया है। जबड़े को काटकर जरूरत के अनुसार आगे-पीछे कर टाइटेनियम की प्लेट से जोड़ दिया जाता है।

डॉ. अजय रॉय चौधरी, हेड, मैक्सोफेसियल सर्जरी विभाग, एम्स, नई दिल्ली

आयुष्मान भारत योजना के तहत निशुल्क करा सकते हैं
पहले महिलाएं शादी के लिए इस तरह की सर्जरी कराती थीं, लेकिन इन दिनों सोशल मीडिया पर फोटो डालने के चलन ने पुरुष मरीजों का रुझान भी बढ़ाया है। आयुष्मान भारत योजना के तहत इसे निशुल्क कराया जा सकता है। एम्स के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया ने इस पहल की सराहना की है।

हड्डियां काटने के लिए अल्ट्रासोनिक पिजो इलेक्ट्रिक मशीन की सहायता ली जाती है। इससे आस-पास के सॉफ्ट टिशु को नुकसान नहीं होता है।

डॉ. अंकिला भूटिया, एम्स



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Defective jaw surgery can be done without marks on the face in AIIMS

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दूध पीते समय बच्चे का हांफना और शरीर नीला पड़ना दिल की बीमारी का लक्षण


हेल्थ डेस्क. यदि आपका नवजात बच्चा दूध पीते-पीते हांफ रहा है और बीच-बीच में रुक रहा है तो इसे हल्के में न लें। फौरन डॉक्टर को दिखाएं, ऐसा न हो कि आपके बच्चे को दिल की बीमारी हो। बच्चों में दिल की बीमारी के लक्षणों के बारे में रविवार को गंगाराम अस्पताल में जानकारी दी गई।

चिल्ड्रन हार्ट डे कार्यक्रम में सर गंगाराम अस्पताल के पीडियाट्रिक हार्ट सर्जन डॉ. नीरज अग्रवाल ने बताया कि दिल की बीमारी से पीड़ित बच्चों में से 95-97 % लक्षण जन्मजात होते हैं। कुछ मामलों में बाद में पता चलता है। इन लक्षणों का पता लगाने के बाद कंफर्म करने को इको टेस्ट होता है। इन बच्चों की समय पर सर्जरी के बाद वे ठीक हो सकते हैं, लेकिन अक्सर लड़कियों के मामले में लोग सर्जरी नहीं कराते। देश में दिल की बीमारी से पीड़ित बच्चों की संख्या प्रति हजार 8 है।

अगर ऐसा दिखे तो अलर्ट हो जाएं
दूध पीते समय बच्चे का रुक-रुककर जोर-जोर से सांस लेना, ज्यादा पसीना निकलना, सांस फूलना, बार-बार निमोनिया होना, छाती में संक्रमण, वजन न बढ़ना व शरीर का नीला पड़ जाना दिल की बीमारियों के लक्षण हैं।



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during breastfeeding child gasps are Symptoms of heart disease

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अच्छा बैक्टीरिया बुरे बैक्टीरिया से बचाएगा, ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने बनाई नोज ड्रॉप जिसमें मौजूद जीवाणु दिमागी बुखार से बचाएगा


हेल्थ डेस्क. अब अच्छा बैक्टीरिया बुरे बैक्टीरिया के संक्रमण से बचाएगा। ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने ऐसी नोज ड्रॉप बनाई है जिसमें काफी संख्या में ऐसे गुड बैक्टीरिया हैं जो मेनिनजाइटिस के संक्रमण को रोकेंगे। इसे ब्रिटेन के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ रिसर्च के साउथैम्पटन बायोमेडिकल रिसर्च सेंटर ने तैयार किया है। दुनिया में पहली बार ऐसी ड्रॉप तैयार की गई है और हाल ही में इसका ट्रायल भी किया गया है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक ड्रॉप में खास तरह का बैक्टीरिया है जो संक्रमण से लड़ने का काम करता है। मेनिनजाइटिस यानि दिमागी बुखार एक संक्रामक रोग है जो किसी भी उम्र वर्ग के लोगों को हो सकता है। लेकिन इसके सबसे ज्यादा मामले नवजात और छोटे बच्चों में देखे जाते हैं। ये बैक्टीरिया औरवायरस से फैलता है। इसे खतरनाक रोग माना जाता है क्योंकि कई बार मेनिनजाइटिस के इलाज में घंटे भर की देरी भी जानलेवा हो सकती है

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वैज्ञानिकों के अनुसार निसेरिया लेटक्टमिका नाम का बैक्टीरिया नाक के जरिए होने वाले संक्रमण से बचाता है। ये मेनिनजाइटिस बीमारी का कारण बनने वाली बैक्टीरिया निसेरिया मेनिनजाइटिडिस से बचाता है। युवाओं में करीब 10 फीसदी ऐसे बैक्टीरिया पाए जाते हैं जो मेनिनजाइटिस के लिए जिम्मेदार होते हैं। ये नाक और गले में होते हैं।कुछ मामलों में ये रक्त में मिलकर जान को जोखिम में डालने वाले संक्रमण की स्थिति बनाते हैं। इसके अलावा ब्लड पाॅइजनिंग का कारण भी बनते हैं जिसे सेप्टिसीमिया कहते हैं।

ब्रिटेन में मेनिनजाइटिस से हर साल होती हैं 1500 मौतें
ब्रिटेन में हर साल बैक्टीरिया से होने वाले मेनिंगोकोकल मेनिनजाइटिस से 1500 मौतेंहोती हैं। साउथैम्पटन बायोमेडिकल रिसर्च सेंटर के डायरेक्टर रॉबर्ट के अनुसार, ऐसा देखा गया है कि नाक में निसेरिया लेटक्टमिका बैक्टीरिया होने पर इसका इम्यून रिस्पॉन्स इतना तेज होता है कि नुकसान पहुंचाने वाले जीवाणु को रोका जा सकता है। ऐसा कई मरीजों में देखा भी जा चुका है। ऐसे बैक्टीरिया की संख्या बढ़ाकर रोग का खतरा कम किया जा सकता है।

नाक में ड्रॉप के जरिए संक्रमण रोकने का तरीका भविष्य में एक थैरेपी की तरह होगा। जिसकी मदद से ऐसी बीमारियों को रोकने में मदद मिलेगी जो नाक के जरिए शरीर में फैल सकती हैं। जैसे निमोनिया और कानों से जुड़ी बीमारियां।

प्रोफेसर रीड, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन

क्या है मेनिंगोकोकल मेनिनजाइटिस
निसेरिया मेनिंजाइटिडिस बैक्टीरिया को मेनिंगोकोकल भी कहते हैं। यह शरीर में पहुंचकर त्वचा, आहार नाल, श्वांसनलिका में संक्रमण फैलाती है। कई मामलों में बैक्टीरिया रक्त के माध्यम से दिमाग तक पहुंच जाता है और जान का खतरा बन जाता है। अचानक तेज बुखार, लगातार सिरदर्द होना, गर्दन में अकड़नऔर उल्टी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। त्वचा पर लाल चकत्ते होना रक्त में संक्रमण का लक्षण है।



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First nose drop contains good bacteria prevent deadly meningitis in uk

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वैज्ञानिकों को मस्तिष्क में मिला दो मिमी का नया हिस्सा, पार्किंसन के इलाज में मिलेगी मदद


हेल्थ डेस्क. मानव मस्तिष्क में 2 मिलीमीटर आकार के एक नए हिस्से की खोज की गई है। यह खोज करने वाले ऑस्ट्रेलियाई न्यूरोसाइंटिस्ट प्रो. जॉर्ज पेक्सिनोस के मुताबिक इसे ‘एंडोरेस्टिफॉर्म न्यूक्लियस' नाम दिया गया है।

प्रो. पेक्सिनोस और उनकी टीम ने इसकी खोज स्टेनिंग और इमेजिंग तकनीक से की है। दरअसल, मस्तिष्क की संरचना पर नयामैप बनाने के लिए वैज्ञानिक मानव मस्तिष्क की तस्वीरें ले रहे थे, तभी उन्हें यह अलग हिस्सा नजर आया। उन्होंने ‘एंडोरेस्टिफॉर्म न्यूक्लियस' की खोज से जुड़ी जानकारी अपनी किताब ‘ह्यूमन ब्रेन स्टेम’ में दी है।

एंडोरेस्टिफॉर्म नाम देने की वजह
यह हिस्सा उस जगह पाया गया है जहां मस्तिष्क स्पाइनल कॉर्ड से मिलता है। यह छोटा-सा हिस्सा मस्तिष्क के निचले सेरिबेलर पेंडुकल के अंदर है और इसे रेस्टिफॉर्म बॉडी भी कहा जाता है। इसीलिए इसे 'एंडोरेस्टिफॉर्म न्यूक्लियस' नाम दिया गया है।

दिमाग के खास हिस्से में है इसकी लोकेशन
ऑस्ट्रेलिया के न्यूरोसाइंस रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रो. पेक्सिनोस दुनिया के जाने माने ब्रेन कार्टोग्राफर हैं। प्रो. पेक्सिनोस के अनुसार ब्रेन में खोजे गए इस खास हिस्से के कार्य को लेकर अभी शोध जारी है। यह मस्तिष्क के उस हिस्से में पाया गया है जो सूचनाओं के आदान-प्रदान और शरीर का संतुलन बनाने में मदद करता है।

पार्किंसन और मोटर न्यूरॉन बीमारियों के उपचार में मदद
प्रो. पेक्सिनोस का मानना है कि खोज में सामने आया नया हिस्सा पार्किंसन और मोटर न्यूरॉन बीमारियों के इलाज में मदद कर सकता है। पार्किंसन मस्तिष्क से जुड़ी ऐसी बीमारी है जिसमें मरीज के शरीर में कंपन और अकड़न होती है। इससे उसे चलने और शारीरिक संतुलन बनाने में दिक्कत होती है। वहीं मोटर न्यूरॉन डिजीज में ब्रेन से जुड़ी नर्व डैमेज हो जाती हैं। शरीर के अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं और व्यक्ति चल-फिर पाने की स्थिति में भी नहीं रह जाता।

दूसरे जानवरों के मस्तिष्क में नहीं है यह हिस्सा
प्रो. पेक्सिनोस के मुताबिक 'एंडोरेस्टिफॉर्म न्यूक्लियस' जैसी कोई भी संरचना बंदरों या दूसरे जानवरों में नहीं पाई गई है। हालांकि प्रो. पेक्सिनोस ने इंसानी प्रजाति के सबसे करीब माने जाने चिम्पांजी के मस्तिष्क का अध्ययन नहीं किया है। अब वे इसके अध्ययन की योजना बना रहे हैं।



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Neuroscientists Discovered Hidden Region in The Human Brain

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मथुरा में हाथियों के इलाज के लिए देश का पहला अत्याधुनिक अस्पताल खुला


हेल्थ डेस्क. उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में शुक्रवार को घायल और बीमार हाथियों के इलाज के लिए आधुनिक अस्पताल की शुरुआत की गई। यह देश का पहला अस्पताल है जो खासतौर पर हाथियों के इलाज के लिए खोला गया है। इसकी स्थापना दक्षिण एशिया में वन्यजीवों के लिए कार्य करने वाली संस्था वाइल्ड लाइफ एसओएस ने की है। हॉस्पिटल में वायरलेस डिजिटल एक्स-रे, लेजर ट्रीटमेंट, डेंटल एक्स-रे, अल्ट्रासोनोग्राफी, हाइड्रो थैरेपी जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।

फराह खंड के चुरमुरा गांव में बने अस्पताल में घायल हाथियों को उठाने, पैथोलॉजी प्रयोगशाला, वजन नापने की डिजिटल मशीन समेत लंबे इलाज के लिए अत्याधुनिक सुविधाएं हैं। हॉस्पिटल में पशु चिकित्सा की पढ़ाई करने वाले छात्रों और ट्रेनीज को आने की इजाजत होगी।

वाइल्ड लाइफ एसओएस एनजीओ के सीईओ कटिक सत्यनारायण ने कहा, यह सुविधा वन्यजीवों के संरक्षण की कड़ी में यह पहल मील का पत्थर साबित होगी। हॉस्पिटल में मौजूद सुविधाओं से उनका बेहतर ध्यान रखा जा सकेगा। इसे धीरे-धीरे ऐसे सेंटर के तौर पर विकसित किया जाएगा जिसे हाथियों की देखरेख के बेहतर मैनेजमेंट के तौर पर जाना जाएगा।

एनजीओ वाइल्ड लाइफ एसओएस ने 2010 में मथुरा में देश के पहले एलिफेंट कंसर्वेशन केयर सेंटर की शुरुआत की थी जहां वर्तमान में 20 हाथियों का विशेष उपचार किया जा रहा है।



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Indias First Elephant Hospital Opens In Mathura by NOG wildlife SOS
Indias First Elephant Hospital Opens In Mathura by NOG wildlife SOS
Indias First Elephant Hospital Opens In Mathura by NOG wildlife SOS
Indias First Elephant Hospital Opens In Mathura by NOG wildlife SOS
Indias First Elephant Hospital Opens In Mathura by NOG wildlife SOS
Indias First Elephant Hospital Opens In Mathura by NOG wildlife SOS
Indias First Elephant Hospital Opens In Mathura by NOG wildlife SOS
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Indias First Elephant Hospital Opens In Mathura by NOG wildlife SOS

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नाक में फिट होने वाला एयर फिल्टर बनाया, प्रदूषण के 90% कण शरीर में जाने से रोकेगा


हेल्थ डेस्क. दिल्ली और एनसीआर के इलाकों में बढ़ता प्रदूषण लोगों को बीमार बना रहा है। प्रदूषण से जूझते ऐसे ही शहरों के लोगों के लिए अमेरिका के इंजीनियरों ने नाक में फिट होने वालाखास तरह का एयर फिल्टरबनाया है। दावा है कि यह सांस के साथजाने वाले 90% प्रदूषण के कण, एलर्जेंस (एलर्जी पैदा करने वाले कण) और बैक्टीरिया को रोकने में सक्षम है।

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कीमत 925 रुपए
इसे ऑक्सीजन नोज फिल्टर नाम दिया गया है। 10 फिल्टर वाले पैकेट की कीमत 925 रुपए है। इसे नाक के अंदर आसानी से लगाया जा सकता है। बाहर से देखने पर पता नहीं चलता कि फिल्टर का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस कारण इसे अदृश्य एयर फिल्टर भी कहा जा रहा है। यह चार अलग-अलग आकार में उपलब्ध है।

कई तरह की बीमारियों से बचाएगा
ऑक्सीजन नोज फिल्टर सिर्फ प्रदूषण, एलर्जेंस और बैक्टीरिया से ही नहीं बचाता बल्कि हवा से फैलने वाली संक्रमित बीमारियों का खतरा भी कम करता है। एक फिल्टर को 12 घंटे तक इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें लगे इलेक्ट्रोस्टेटिक फिल्टर हवा में मौजूद बारीक कणों को रोकने में मदद करते हैं। शिकागो यूनिवर्सिटी के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के मुताबिक वायु प्रदूषण लोगों की जिंदगी 1.8 साल तक कम करता है। दुनिया में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर हाल ही में डब्ल्यूएचओने चिंता जताई थी। करीब एक दशक पहले एयर पॉल्युशन को कम करने के लिए डब्ल्यूएचओ ने गाइडलाइन जारी की थी जिसे अमेरिका ने सख्ती से लागू किया था। नतीजा आज यहां प्रदूषण का स्तर काफी कम है।



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air filter that stick up NOSE blocks 90 percent of pollution particles

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दुनिया का पहला 3डी बॉडी स्कैनर, 20 सेकंड में बताता है कैंसर और संक्रमण की लोकेशन, दावा- 40 गुना कम रेडिएशन


हेल्थ डेस्क. कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों ने ऐसा 3डी बॉडी स्कैनर बनाया है जो 20 सेकंड में पूरे शरीर की तस्वीर दिखाता है। इसे ‘एक्सप्लोरर स्कैनर’ नाम दिया गया है। दुनिया के इस पहले 3डी स्कैनर को पैट स्कैन और एक्स-रे की तकनीक मिलाकर तैयार किया गया है। सबसे खास बात है कि मशीन इंसान के शरीर में बीमारी का पता लगाने के साथ कैसे कैंसर और संक्रमण फैल रहा है इसे वीडियो के रूप में रिकॉर्ड करने में सक्षम है। 3डी वीडियो होने के कारण शरीर के हर हिस्से की सटीक जानकारी मिलने पर इलाज आसानी से किया जा सकेगा। इसे कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सिमोन चैरी और रामसे बडावी ने एक दशक की रिसर्च के बाद तैयार किया है।

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एक्सप्लोरर स्कैनर रेडिएशन की मदद से काम करता है। यह तकनीक पॉजीट्रॉन इमिशन टोमोग्राफी (पैट) और एक्स-रे कॉम्प्यूटेड टाेमोग्राफी (सीटी) का तालमेल है।

प्रोफेसर चेरी,कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी

20 सेकंड में 40 गुना तेज और स्पष्ट स्कैन का दावा
प्रोफेसर चेरी के मुताबिक, पैट और सीटी स्कैन शरीर के किसी खास हिस्सों की तस्वीरें जारी करता है लेकिन इनकी कुछ सीमाएं हैं जैसे मरीज को रेडिएशन की हाई डोज दी जाती है। एक्सप्लोरर दूसरे बाॅडी स्कैनर के मुकाबले बेहद स्पष्ट स्कैन जारी करता है और 40 गुना तेजी से काम करता है। करीब 20-30 सेकंड में पूरे शरीर को स्कैन कर लेता है।

रेडिएशन का कम खतरा
पैट स्कैन से बॉडी की 3डी तस्वीर लेने के लिए मरीज के शरीर में रेडियोएक्टिव पदार्थ (ट्रेसर) इंजेक्ट किया जाता है। जो भविष्य में कई तरह की समस्या खड़ी कर सकता है। खासतौर पर ऐसे बच्चों के लिए जो अक्सर स्कैनिंग के दौरान नुकसान पहुंचाने वाले रेडिएशन से गुजरते हैं। पैट स्कैन की तुलना में एक्सप्लोरर स्कैनर 40 गुना कम रेडिएशन का इस्तेमाल करता है।

अलग-अलग मशीनों में स्कैन तस्वीरों की बेहतर क्वालिटी और दी जाने वाली रेडिएशन की डोज में फर्क हो सकता है लेकिन इन सभी मशीनों से एक्सप्लोरर ज्यादा स्पष्ट स्कैन करता है और कम रेडिएशन वाला होने के कारण ज्यादा सुरक्षित है।

प्रोफेसर चेरी,कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी


देख सकते हैं बीमारी की लोकेशन और ब्लड फ्लो
प्रोफेसर चेरी के अनुसार, कैंसर शरीर के किस हिस्से में फैल रहा है इसे मात्र एक स्कैन से पता लगा सकते हैं। एक्सप्लोरर की मदद से शरीर मेंं रक्तसंचार कहां-कहां हो रहा है, शुगर कितनी अवशोषित हो रही है और दवाएं कहां जा रही हैं जैसी जानकारी भी मिलती है। इसकी शुरुआत जून 2019 से होगी। इस मशीन को चीनी कंपनी यूनाइटेड इमेजिंग हेल्थकेयर की मदद से तैयार किया गया है। इसे बनाने में नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने आर्थिकतौर पर मदद की है। मशीन द्वारा लिया गया पहला स्कैन रेडियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ नॉर्थ अमेरिका अगले हफ्ते जारी करेगी।

स्कैन में दिखने वाली बारीकियां आश्चर्यजनक
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में न्यूक्लियर मेडिसन के चीफ प्रोफेसर भादवी के मुताबिक वह भी इसके नतीजों से आश्चर्यचकित रह गए थे। बॉडी स्कैन की बारीकियों का स्तर चौकाने वाला है जिसे पैट स्कैन से अब नहीं देखा गया होगा। शरीर में घूमते हुए केमिकल कंपाउंड (रेडियोट्रेसर) को 3डी रूप में देखना अद्भुत अनुभव था। अब तक ऐसी कोई डिवाइस नहीं जो इंसान के शरीर की जानकारी इस तरह दे सके।



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एक्सप्लोरर स्कैनर के साथ कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सिमोन चैरी और रामसे भादवी

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बढ़ते प्रदूषण में डायसन एयर प्यूरीफायर की बाज़ार में बढ़ी मांग



देश की हवा में बढ़ते हुए प्रदूषण ने आम जनता के साथ सरकार की नाक में भी दम कर रखा है। जिस वजह से लोगों में सांस संबंधी बीमारियों का खतरा दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। लोग घर से बाहर निकालने के लिए मास्क का प्रयोग भी करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बाहर की अपेक्षा घर और दफ्तरों में प्रदूषण की काफ़ी अधिक मात्रा पायी जाती है, जिसके कई कारण हो सकते हैं।

घर और दफ्तर में सही वेंटीलेशन की सुविधा न होना
खाना बनने से होने वाला प्रदूषण
रेफ्रिजरेटर और ओवन जैसे उपकरण से निकालने वाली हानिकारक गैस
कीटनाशकों को मारने के लिए उपयोग में लाने वाली मशीन और स्प्रे
धूम्रपान का सेवन करना

इन्ही सब कारणों से घर के अंदर भी प्रदूषण की मात्रा बढ़ती जा रही है। इसलिए बढ़ते प्रदूषण से बचने के लिए अब डॉक्टर्स और एक्सपर्ट् घरों में एयर प्यूरीफायर लगाने की सलाह दे रहें हैं और इन्हीं कारणों से पिछले कुछ समय में बाज़ार में एयर प्यूरिफ़ायर की मांग काफी बढ़ गयी है।

क्या होता है एयर प्यूरीफायर?

एयर प्यूरीफायर एक ऐसी मशीन है जो हवा में फैले हानिकारक तत्वों जैसे बैक्टीरिया, स्पोर्स, पोलेन, धूल, बैक्टीरिया और पेट डेंडर को खत्म कर जहरीली हवा को साफ और प्रदूषण मुक्त बनाती है।

एयर क्वालिटी का का स्तर दिन प्रतिदिन घटता जा रहा है जिससे लिवर समेत सभी अंगों पर भी इसका बुरा असर हो रहा है साथ ही ये लोगों की इम्युनिटी सिस्टम पर भी गहरी चोट पहुंचा रही है। इसलिए अगर आप भी एयर प्यूरिफ़ायर लेने की सोच रहें हैं तो बेहतर परिणाम के लिए ऐसे मॉडल खरीदें, जो HEPA फिल्टर और चार फिल्टरेशन लेयर के साथ आते हैं। बजट कम होने की पर आप तीन फिल्टर लेयर वाले एयर प्यूरिफ़ायर मॉडल भी ले सकते हैं जो एयर प्यूरिफायर PM 2.5 पार्टिकल को फिल्टर करे। जिससे लोग घर में साफ हवा में सांस ले सकें और अपने आप को बीमारियों से बचा पाएँ।

इसके अलाव आप कुछ पौधों के जरिए भी घर की हवा को प्यूरिफाई कर सकते हैं। जिसमें तुलसी,ऐलोवेरा,स्पाइडर प्लांट और रबर प्लांट को रखना बेहद फायदेमंद रहेगा।



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बुजुर्गों में डिप्रेशन को दूर कर सकती है वीडियाे चैट, अमेरिका की ऑरेगन यूनिवर्सिटी का दावा


हेल्थ डेस्क. तकनीक का अधिक प्रयोग जहां इसके यूजर्स के लिए डिप्रेशन का कारण बन रहा है वहीं टेक्नोलॉजी ही इससे उबरने का रास्ता दिखा रही है। हालिया हुई रिसर्च इसका एक उदाहरण है। उम्रदराज लोगों को अगर दोस्तों और परिजनों के साथ वीडियाे चैट कराई जाए तो उनका डिप्रेशन दूर हो सकता है। अमेरिका की ऑरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी ने यह दावा किया है। शोधकर्ताओं ने 60 वर्ष से अधिक उम्र के 1,424 लोगों पर रिसर्च के बाद नतीजे जारी किए हैं।

दो साल हुई रिसर्च
अमेरिकन जर्नल ऑफ जेरियाट्रिक सायकियाट्री में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार डिप्रेशन से पीड़ित 60 वर्ष के उम्र के लोगों को चार ग्रुप में बांट कर अध्ययन किया गया। प्रत्येक ग्रुप के लोगों को कम्युनिकेशन के अलग-अलग माध्यम से जोड़ा गया। इनमें वीडियो चैट, ई-मेल, सोशल नेटवर्क और इंस्टेंट मैसेजिंग एप को शामिल किया गया। दो साल के शोध के बाद नतीजा निकला कि कम्युनिकेशन के चार माध्यमों में से वीडियो चैट ही डिप्रेशन से उबारने में कारगर है।

ऐसे बुजुर्ग जो वीडियो चैट प्लेटफार्म जैसे स्काइप का इस्तेमाल करते हैं उनमें डिप्रेशन होने का खतरा काफी हद तक कम रहता है।

एलन, एसोसिएट प्रोफेसर, ऑरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी

नहीं दिखा सोशल मीडिया का असर
ऐसे बुजुर्ग जिन्होंने रिसर्च के दौरान ई-मेल, मैसेजिंग एप और साेशल मीडिया प्लेटफार्म जैसे फेसबुक का इस्तेमाल किया उनमें डिप्रेशन का स्तर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल न करने वालों के बराबर था। शोधकर्ताओं के मुताबिक वीडियो चैट और डिप्रेशन के बीच सम्बंध स्थापित करने वाली यह पहली रिसर्च है।



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Video chats can reduce the level depression in older adults

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70 फीसदी डॉक्टर दिन में 3 से ज्यादा सेल्फी लेते हैं, पीजीआई रोहतक ने डॉक्टरों की मोबाइल एक्टिविटी पर किया शोध


हेल्थ डेस्क.जो लोग दिन में 3 या इससे ज्यादा बार सेल्फी लेते हैं, वे सेल्फाइटिस डिसऑर्डर से पीड़ित हो सकते हैं। सेल्फी की इस आदत से देश के डॉक्टर भी अछूते नहीं हैं। पीजीआई, रोहतक के 50 डाॅक्टरों पर हुई रिसर्च से इसका खुलासा हुआ है। 70% डॉक्टर एक दिन में 3 बार सेल्फी लेने के आदी हैं। 72% तो बाथरूम में भी मोबाइल का प्रयोग करते हैं। ये रिसर्च पीजीआई के मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के राज्य व्यसन निर्भरता उपचार केंद्र में हुई। संभवत: देश मेंसेल्फी को लेकर डॉक्टरों पर हुआ यह पहला अध्ययन है।

सर्वे से जुड़ी 5 खास बातें

  • मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के निदेशक और सीईओ डॉ. राजीव गुप्ता के नेतृत्व में की गई रिसर्च में शोधकर्ताओं ने 50 डॉक्टरों की मोबाइल एक्टिविटी का अध्ययन किया। नतीजा निकला कि 22% डॉक्टर दिन में 6 बार, 6% डॉक्टर 9 बार सेल्फी लेने के आदी हैं।
  • ज्यादा सेल्फी लेने की इस आदत को लंदन और तमिलनाडु के शोधकर्ताओं ने 'सेल्फाइटिस' का नाम दिया है। भारत में फिलहाल करीब 40 करोड़ लोग इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। इनमें 19 से 40 साल उम्र के 85% यूजर हैं। रिसर्च में ये भी पता चला कि 24% डॉक्टर हर दिन 2 घंटे से ज्यादा समय तक मोबाइल पर फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं।
  • 32% डॉक्टर एक घंटे से कम और 44% डॉक्टर 1 से 2 घंटे तक फेसबुक इस्तेमाल करते हैं। 12 प्रतिशतडॉक्टर पढ़ाई के लिए मोबाइल का प्रयोग 1 घंटे से भी कम समय करते हैं। 20 फीसदी डॉक्टर 1 से 2 घंटे, जबकि 68 प्रतिशत डॉक्टर 3 घंटे से ज्यादा पढ़ाई के लिए मोबाइल का प्रयोग करते हैं।
  • रिसर्च टीम ने बताया कि सेल्फाइटिस से पीड़ित लोग ज्यादातर अपना आत्मविश्वास बढ़ाने या मूड ठीक करने, दूसरों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने या दूसरों से आगे रहने के लिए सेल्फी लेते हैं। इससे पहले लंदन की नॉटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी और तमिलनाडु के त्यागराजर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट की रिसर्च में भी सामने आया था कि जिन लोगों का दिन में 3 सेल्फी लिए बिना मन नहीं भरता, वे डिसऑर्डर के शिकार हैं। इस रिसर्च में डिसऑर्डर को सेल्फाइटिस नाम दिया। बीमारी का पता लगाने के लिए 200 लोगों के फोकस ग्रुप और 400 लोगों पर सर्वे किया था।
  • सेल्फाइटिस डिसऑर्डर भी तीन लेवल का होता है
  1. 78% डॉक्टर सुबह जगने के 5-10 मिनट के भीतर ही मोबाइल देखते हैं। 18% डॉक्टर उठने के आधा घंटे में और 4% डॉक्टर 1 घंटे बाद मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं।
  2. 78% डॉक्टर रात को सोने से ठीक पहले एक बार जरूर मोबाइल का प्रयोग करते हैं। जबकि 26% डॉक्टर सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करते हैं।
  3. 86% डॉक्टरों का कहना है कि मोबाइल का प्रयोग करने से उनका समय बर्बाद नहीं होता। जबकि सिर्फ 14% ने माना कि इससे समय की बर्बादी होती है।


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PGI rohtak survey on selphi taken by doctors Selfitis

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दिन में 2 घंटे से अधिक टीवी देखने वालों में मौत का खतरा अधिक, कारण ड्रिंकिंग, धूम्रपान और गलत खानपान


हेल्थ डेस्क.अगर आप घंटों तक टेलीविजन देखते हैं तो सतर्क हो जाइए। यह आदत जल्द मौत के खतरे की ओर ले जाती है। दिन में सवा दो घंटे से अधिक देखने पर मौत का खतरा बढ़ जाता है।ब्रिटेन की ग्लास्गो यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने तीन लाख 29 हजार लोगों की 4 घंटे या उससे ज्यादा टीवी देखने की आदत पर स्टडी की। वे इस नतीजे पर पहुंचे कि लंबे समय तक टीवी के सामने बैठे रहने से लोगों को स्मोकिंग, ड्रिंकिंग और गलत खानपान की लत लग जाती है। इससे लोगों में हार्ट की बीमारी का खतरा खासतौर पर बढ़ जाता है। साथ में मोटापा और चिड़चिड़ापन भी। 40 से 69 साल की उम्र के लोगों के बीच की गई स्टडी में ज्यादातर लोग गरीब क्षेत्रों में रहने वाले हैं।

ऐसे हुई स्टडी

  • स्टडी दो भागों में की गई। एक वे जो चार घंटे या उससे ज्यादा समय तक टीवी देखते हैं। दूसरे वे जो इससे कम देखते हैं।
  • सबसे स्वस्थ जीवन शैली वाले लोगों ने अपने टीवी सेट को 2 घंटे 2 मिनट के लिए ही देखा जबकि 2 घंटे 9 मिनट तक देखने वाले मामूली स्वस्थ थे।
  • वैज्ञानिकों ने ऐसे बहुत से लोगों का भी परीक्षण किया जो रोजाना 7 घंटे से कम और 9 घंटे से ज्यादा सोते हैं।

ये आए परिणाम

निष्कर्ष बताते हैं कि वे बहुत अधिक या बहुत कम नींद लेते हैं। इससे उनकी सेहत खराब हो रही है और छोटे जीवन का कारण बन रही है। अन्य कारणों में मोटापा, शारीरिक हलचल, धूम्रपान, पीने और खानपान जैसे विषय सामने आए। वैज्ञानिकों ने इस आदत से बचने के लिए घर पर ही हल्की-फुल्की कसरत की सलाह दी है। स्टडी में ज्यादा टीवी देखने वाले स्त्री-पुरुषों के मोटापे में वृद्धि देखी गई। हफ्ते में 5 घंटे या उससे कम टीवी देखने वाले लोगों की अपेक्षा 21 घंटे या उससे ज्यादा टीवी देखने वाले लोगों के मोटापे में दोगुनी वृद्धि पाई गई। स्टडी में अंतिम निष्कर्ष यही था कि टीवी देखने का समय और नींद की अवधि जीवन शैली के लिए सबसे ज्यादा जोखिम भरे माने गए।


पैर की नसों में ब्लड क्लॉटिंग से बढ़ता मौत का जोखिम
लगातार ढाई घंटे या उससे ज्यादा समय तक टीवी देखने से 'पल्मोनरी एम्बोलिस्म' का खतरा होता है। इस स्थिति में आपकी पैर की नसों में ब्लड क्लॉट हो जाते हैं, जिससे फेफड़ों तक ब्लड फ्लो सही तरह नहीं हो पाता है, इससे मौत का जोखिम बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं ने इस आदत से मोटापा, आंखों की परेशानी, चिड़चिड़ापन और हार्ट की बीमारी बहुत तेजी से पनपने के खतरे बताए हैं। स्टडी करने वाली टीम के सदस्य मार्टिनेज गोंजालेस का कहना है कि हमारी स्टडी बताती है कि लोगों को अपनी शारीरिक गतिविधि बढ़ाने की तरफ ध्यान देना चाहिए। रोजाना टीवी देखने का समय एक से दो घंटे तक ही रखना चाहिए।



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Watching more than 2hours of daytime TV can lead to an early death

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दारा सिंह ने बादाम और देसी घी खाकर बनाई फौलाद जैसी बॉडी, हफ्ते में एक दिन करते थे व्रत


हेल्थ डेस्क.आज 'रूस्तम-ए-हिंद' कहे जाने वाले पहलवान दारा सिंह का बर्थडे है। अब भले ही वो इस दुनिया में न हों लेकिन उनके फिटनेस टिप्स आज भी लोगों के लिए कारगर हैं। पंजाबमेंजन्मे दारा सिंह का पूरा नाम दारा सिंह रंधावा था। पहलवानी में उन्होंने नेशनल ही नहीं बल्कि इंटरनेशनल लेवल पर भी कई खिताब अपने नाम किए। रामायण में हनुमान का किरदार निभाया। जानिए दारा सिंह ने बॉडी बनाने के लिए डाइट में किन चीजों का इस्तेमाल किया...

डाइट में क्या लेते थे दारा सिंह

  • वे रोजाना 100 ग्राम बादाम खाते थे।
  • मुरब्बा और शुद्ध घी भी उनकी डाइट में शामिल था।
  • वे रोजाना दो लीटर दूध पीया करते थे।
  • आधा किलो मीट खाते थे।
  • रोजाना सिल्वर वर्क के साथ 6 से 8 रोटी खाते थे।

ब्रेकफास्ट नहीं करते थे

  • हर हेल्दी पर्सन ब्रेकफास्ट जरूर करता था लेकिन वे ब्रेकफास्ट नहीं करते थे।
  • वे दिन में सिर्फ दो ही बार खाना खाते थे।
  • वर्किंग के बाद वे अक्सर ठंडाई लिया करते थे। इसके बाद में चिकन और लेम का सूप लेते थे।
  • इन सबके अलावा वे हफ्ते में एक बार उपवास रखते थे। इससे उनका मेटाबॉलिज्म अच्छा रहता था।
  • उन्होंने अपनी बॉडी को बनाने के लिए कभी भी आर्टिफिशियल डाइट नहीं ली। पूरी बॉडी नेचुरल डाइट से ही बनाई।


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Dara Singh Diet and Fitness Schedule

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समझें मेटाबॉलिज्म का गणित, अंगुली के निशान की तरह यह सबका अलग-अलग होता है


हेल्थ डेस्क. अक्सर एक्सपर्ट मेटाबॉलिज्म बेहतर बनाने के लिए लाफस्टाइल में बदलाव करने के लिए कहते हैं। बेहतर मेटॉबलिज्म यानी स्वस्थ इंसान। मेटाबॉलिज्म का अर्थ है कि कैसे कोशिकाएं उस ऊर्जा का उपयोग करती हैं जो पाचन के दौरान भोजन से अवशोषित की गई हैं। अक्सर लोगों में इससे जुड़े कई भ्रम होते हैं। सीनियर न्यूट्रिशनिस्ट कनिका मल्होत्रा बता रही हैं इससे जुड़े तथ्य...

भ्रम : जन्म के समय ही मेटाबॉलिज्म व्यक्ति का तय हो जाता है।
सच : कुछ हद तक सही है प्रत्येक व्यक्ति का मेटाबॉलिज्म अंगुली के निशान जैसा अनूठा होता है। कुछ लोगों का मेटाबॉलिज्म तेज होता है जबकि कुछ का धीमा। चाहे यह तेज हो या धीमा इसका निर्धारण मेटाबॉलिक दर से होता है जिसे बेसल मेटाबॉलिक रेट या बीएमआर कहा जाता है जो कि कैलोरीज की वह मात्रा है जिसे व्यक्ति आराम करते समय जलाता है। भले ही जीन्स में मेटाबॉलिज्म की दर धीमी हो तब भी आप इसे बढ़ा सकते हैं। बीएमआर बढ़ाने के लिए वजन घटाने का प्रशिक्षण एक जरूरी रास्ता है। लेकिन एरोबिक गतिविधि से भी शरीर को कैलोरी जलाने में मदद मिलेगी।

भ्रम : कैफीन बेवरेज ग्रीन टी, कॉफी मेटाबॉलिज्म दुरुस्त रखते हैं।
सच : यह सही है। ग्रीन टी का एंटीऑक्सीडेंट और कैफीन कैलोरी बर्न करने की क्षमता बढ़ाती है। ग्रीन टी चुनते समय अधिक एंटीऑक्सीडेंट और कैफीन स्तर को ध्यान में रखें। यदि पहले ही कैफीन ले लिया है तो ग्रीन टी का प्रभाव सीमित रहने की संभावना है।

भ्रम : अधिक खाना एक साथ खाने से मेटाबॉलिज्म स्लो होता है।
सच : कैलोरीज में अचानक बढ़ोत्तरी से अंततः शरीर पर मेहनत करने के लिए बोझ बढ़ जाएगा जिससे मेटाबॉलिज्म घट सकता है। मेटाबॉलिज्म बढ़ाने के लिए सबसे अच्छा रास्ता दिन के दौरान अधिक गतिविधियों में खुद को लगाना है। यदि नियमित तौर पर अधिक खाना खा रहे हैं तो खाने की आदत पर नियंत्रण के लिए आहार विशेषज्ञ से परामर्श लें।

भ्रम : खाना स्किप करने से मेटाबॉलिज्म स्लो होता है।
सच : जब कैलोरी की आवश्यक मात्रा से कम खाते हैं तो शरीर भुखमरी की स्थिति में जाकर अपने संसाधनों की रक्षा के लिए काम करता है, जिससे मेटाबॉलिज्म धीमा होता है। पर्याप्त नींद लेना चाहिए। सुबह का नाश्ता नहीं छोड़ना चाहिए।



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what is metabolism and how it works myths and facts about metabolism

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दुनियाभर में सिर्फ भारत में घटा मलेरिया, क्योंकि हेल्थ वर्कर्स ने ओडिशा में किया गजब का काम


हेल्थ डेस्क. विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां 2017 में मलेरिया के मामलों में गिरावट देखी गई है। रिपोर्ट में दुनियाभर के 11 मलेरिया प्रभावित देशों को शामिल किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पिछले साल मलेरिया के मरीजों में 4 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। यह मलेरिया के मामलों में कमी लाने के कदम की आेर एक सफल कदम है। देशभर में मलेरिया के 40 फीसदी मामले सिर्फ ओडिशा में देखे जाते हैं। लेकिन रिपोर्ट की सबसे खास बात है कि राज्य में 2016 में मलेरिया के मामलों में 24 फीसदी कमी आई है। इस बड़ा कारण ओडिशा सरकार का एंटी मलेरिया प्रोजेक्ट है। आंकड़ों के मुताबिक राज्य के चार बड़े जिलों में 85 फीसदी मलेरिया के मामलों में कमी आई है।

सफलता का श्रेय आशा और स्वास्थ्य कार्यकर्ता को
एंटी मलेरिया प्रोजेक्ट की सफलता के पीछे कई रिसर्च इंस्टीट्यूट के संयुक्त प्रयास शामिल थे। जिसमें इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मलेरिया रिसर्च, नेशनल वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम और ओडिशा एंड मेडिसिंस फॉर मलेरिया वेंचर शामिल हैं। WHO की रिपोर्ट में मलेरिया के मामलों में कमी आने का श्रेय स्थानीय स्तर पर आशा और स्वास्थ्य कार्यकर्ता को दिया गया है। जिन्होंने खासतौर पर ग्रामीण और अति पिछड़े इलाकों में काम करके प्रोजेक्ट को सफल बनाया।

WHO की पहला का नतीजा था एंटी-मलेरिया प्रोजेक्ट
2012 में वर्ल्ड मलेरिया डे के मौके पर WHO ने दुनियाभर में मलेरिया प्रभावित देशों में बढ़ते मामलों में कमी लाने की पहल की थी। जिसकी टैगलाइन थी टेस्ट, ट्रीट एंड ट्रैक। जिसका मकसद था पहले मलेरिया की जांच, फिर इलाज और इससे दूर रहने के लिए सावधानी अपनाना। WHO की मुहिम में वैश्विक स्तर पर मलेरिया के निदान, इलाज और इससे बचने के लिए प्रयास करने की गुजारिश की गई थी।

2013 में हुई थी एंटी-मलेरिया प्रोजेक्ट की शुरुआत
ओडिशा में एंटी-मलेरिया प्रोजेक्ट की शुरुआत 2013 में हुई थी। प्रोजेक्ट को सबसे पहले राज्य के चार जिलों अंगुल, ढेंकानाल, कन्धमाल और बलांगिर में लागू किया गया। ये चार ऐसे जिले थे जहां मरीजों में मलेरिया की गंभीरता भी अलग-अलग भी। यहां की आबादी करीब 9 लाख थी। इस अभियान के बाद मलेरिया के मामलों में कमी आई। बाद में एंटी-मलेरिया प्रोजेक्ट राज्य के 32 जिलों में लागू किया गया है।



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malaria cases declined by-24 percent in india 85 in odisha says who report

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नेचुरल लुक के लिए मिनिमल मेकअप है ट्रेंड में, कम समय में चाहिए ज्यादा ग्लैमरस लुक


लाइफस्टाइल डेस्क. इस बार हुए मेकअप इंडिया फैशन वीक में मॉडल पूरे आत्मविश्वास के साथ न्यूनतम मेकअप में नजर आईं। मेकअप आर्टिस्ट काजी राय ने कहा कि, हम आज 21वीं सदी में रह रहे हैं, जहां महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर पुरुषों के साथ कार्य कर रही हैं। ऐसे में उनके पास तैयार होने के लिए बहुत कम समय होता है लेकिन फिर भी वह ग्लैमरस और प्रेजेंटेबल लुक चाहती हैं। ऐसे में हम मिनिमल मेकअप और हेअर लुक दिखाते हैं ताकि आज की महिलाएं आसानी से अपना सकें। बहुत सारे उत्पादों को चेहरे पर लगाना अब चलन में नहीं है। थोड़ा सा मेकअप या न्यूड मेकअप अब मेकअप वर्ल्ड में सबसे बड़ा ट्रेंड बन गया है। यह सब कम उत्पादों के बारे में है, ताकि नैचुरल लुक दिखाई दे। यह लुक रैम्प से स्ट्रीट तक प्रयोग किया जा सकता है। फैशन राइटर अस्मिता अग्रवाल बता रही हैं ऐसे ही लुक के बारे में...

न्यूड लिप्स एंड ब्राइट आईशेडो
भारतीय महिलाओं को हमेशा से रेड और पिंक कलर के ब्राइट शेड की लिपस्टिक का प्रयोग करते हुए देखा जाता रहा है। ऐसे में अब ट्रेंड जब मिनिमल मेकअप का बन गया है। तो अगर किसी पार्टी में बाहर जाना है तो न्यूड लिप्स के साथ ब्राइट कलर के आईशेडो जैसे वॉयलेट, ब्लू या ग्रीन जैसे कलर प्रयोग आप चाहें तो कर सकती हैं।

ग्लिटर आईलाइनर
इस बार फैशन वीक में 90 के दशक का स्पार्कल आईलाइनर ट्रेंड अब वापस रैम्प दिखाई दिया। स्वाइप के साथ ग्लिटर आईलाइनर प्रयोग कर सकती हैं। यह लुक डे आउट के बाद गर्ल्स के साथ नाइट आउट के लिए प्रयोग कर सकती हैं।

कलरफुल आईलाइनर
अगर आप हमेशा आईलाइनर में कॉफी-ब्लैक जैसे कलर का प्रयोग करती हैं, तो पिंक और ब्लू जैसे शेड को चुनना कठिन होगा। लेकिन अगर बोल्ड हैं और एक्सपेरिमेंटल हैं तो कुछ रंग आई मेकअप के लिए प्रयोग कर सकती हैं क्योंकि यह समर सीजन में हॉट होगा।

ग्लॉसी लिप और बोल्ड ब्रो
यह सुपर क्विक पार्टी लुक है। इस लुक के साथ सुबह से लेकर रात तक बाहर रह सकती हैं। इस लुक के लिए बस न्यूड ग्लॉस और आईब्रो पेंसिल का पास में होना ही काफी है। अगर दफ्तर में काम खत्म करने के तुरंत बाद कहीं जाने का प्लान है तो ऐसे किसी भी प्लान के लिए यह मिनिमल और क्लासी लुक परफेक्ट है।

नो-मेकअप लुक
वह मेकअप जिसे करने के बाद भी लगे कि जैसे मेकअप नहीं किया है। इस मेकअप को करना आसान है। इस सोफिस्टिकेटेड और क्लासी लुक के लिए बस नहाने के बाद चेहरे पर मॉइश्चराइजर लगा लीजिए ताकि चेहरा हाइड्रेट दिखे। इस लुक के साथ कहीं भी जाने के लिए तैयार हैं।



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minimal makeup and no makeup in trend by expert asmita agarwal

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42 किलोमीटर की दौड़ में इंजरी और थकान से बचने के लिए फंक्शनल ट्रेनिंग जरूरी


हेल्थ डेस्क. सर्दियों से मैराथन का सीजन शुरू हो जाता है। बिना रुके 42 मीटर की दौड़ पूरी करने के लिए फिट होना पहली शर्त है। अक्सर बिना तैयारी मैराथन में भाग लेने वालों में इंजरी, अधिक थकान और बेहोशी के मामले सामने आते हैं। खासकर 40 से अधिक उम्र के लोगों के लिए बिना तैयारी लंबी दूरी की दौड़ परेशानी का सबब बन सकती है। चाहें हाफ (21 किमी.) हो या फुल मैराथन (42 किमी.) दोनों के लिए शरीर का फिजिकली और मेंटली तैयार होना जरूरी है। फिटनेस ट्रेनर विनोद सिंहबता रहे हैं मैराथन के लिए कैसा होना चाहिए फिटनेस प्लान...

  1. यह मैराथन की प्रैक्टिस का पहला पड़ाव है। इसमें स्ट्रेंथ बढ़ाने के लिए हफ्ते में 3-5 बार तेज चलने के लिए कहा जाता है। धीरे-धीरे समय, दूरी और दिनों की संख्या बढ़ाई जाती है। प्री-वर्कआउट सेशन का लक्ष्य प्रेक्टिस का समय और बॉडी की स्ट्रेंथ को बढ़ाना है। सेशन पार्टिसिपेंट की उम्र, वजन और उसकी एक्टिविटी को ध्यान में रखकर प्लान किया जाता है।

  2. इंजरी को राेकने के लिए सेशन में फंक्शनल ट्रेनिंग पर फोकस किया जाता है। मसल्स को मजबूत बनाने के साथ बॉडी की स्ट्रेंथ को बढ़ाया जाता है ताकि लंबी दूरी बिना थके पूरी की जा सके। फंक्शनल ट्रेनिंग का असर बॉडी के हर अंग पर पड़ता है जो आपको मैराथन के लिए तैयार करता है।

    1- स्क्वाट : 10-13 रेपिटिशन के साथ स्क्वाट के 3 सेट करना जरूरी है। स्क्वाट घुटनों की इंजरी को रोकने के साथ स्पीड और सहनशीलता बढ़ाता है।

    2- स्क्वाटस जंप : 10-12 रेपिटिशन के साथ स्क्वाटस जंप के 3 सेट डेली रूटीन में शामिल करते हैं। स्क्वाट जंप पैर की मांसपेशियों को मज़बूत बनाता है और तेज दौड़ने में मदद करता है।

    3- लॉन्ग जंप : 10-13 रेपिटिशन के साथ लॉन्ग जंप के 3 सेट मांसपेशियों को मजबूत बनाते हैं। यह कोर ट्रेनिंग का अहम हिस्सा है जो शरीर की कई मांसपेशियों में इंजरी का खतरा घटाता है।

    4- लंजेज़ : यह वर्कआउट कमर से लेकर पैर तक के हिस्से को मजबूत बनाने के साथ दौड़ते समय बैलेंस के लिए तैयार करता है। इसे 10-13 रिपिटीशन के 3 सेट कर सकते हैं। इसे और बेहतर करने के लिए डंबेल और कैटल बेल का प्रयोग करें।

    5- बर्ड डोग (ग्लूट कोर) : यह वर्कआउट दौड़ने की क्षमता और गति दोनों को बेहतर बनाने में मदद करता है। दोनों पैरों से इसके 10-10 रेपिटिशन करें।

    6- प्लैंक : वर्कआउट के दौरान 30 सेकंड से एक मिनट तक प्लैंक करें। इसे करते समय अपने कूल्हों को सीधे और कोर टाइट रखें। यह वर्कआउट अपर बॉडी को मजबूत बनाने के साथ इंजरी रोकने में मदद करता है।

    7- साइड प्लैंक : 30 सेकंड से 1 मिनट तक साइड प्लेंक की स्थिति में रहें फिर स्विच करें। यह वर्कआउट कंधे, कलाई और हाथों को मजबूत बनाता है।

  3. फिटनेस ट्रेनर विनोद सिंह के मुताबिक मैराथन से पहले ज्यादातर प्रतिभागियों के मन में सवाल होता है कि वह जीतेंगे या नहीं। सबसे जरूरी बात है कि मैराथन से पहले खुद की तुलना एथलीट से न करें, अपने स्टाइल में ही दौड़ें। मैराथन से पहले होने वाली नर्वसनेस को दूर करने के लिए हल्का और सुरीला संगीत सुनें। ऐसा संगीत जो आपके दिल को छूता है। इससे तनाव दूर होगा और नर्वसनेस दूर होगी। नींद पूरी लें। बॉडी को रिलैक्स करने के लिए योग या मेडिटेशन भी कर सकते हैं। मैराथन के लिए हाईड्रेट रहें। इसके लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। पानी से आपकी मसल्स में ब्लड और ऑक्सीजन की सही सप्लाई पर्याप्त रहती है।



    1. Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
      marathon workout plan how to prepare for marathon by functional training

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दिमागी रूप से कमजोर नहीं होते मिर्गी के रोगी, दवाओं से 80 फीसदी तक इलाज है संभव


हेल्थ डेस्क. मिर्गी ऐसी बीमारी है जिसमें रोगी को अचानक दौरा पड़ता है। इस दौरान वह अपना दिमागी संतुलन खो बैठता है और हाथ-पैर अकड़ने लगते हैं। शरीर कांपने लगता है और ऐंठ जाता है। इलाज करवाने पर काफी हद तक बीमारी में राहत मिल जाती है। मिर्गी मस्तिष्क से जुड़ी न्यूरोलॉजिकल बीमारी है। सिर पर चोट लगने, ज्यादा शराब का सेवन करने, ब्रेन ट्यूमर होने पर मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी केी स्थिति में मिर्गी का दौरा पड़ सकता है। मिर्गी को लेकर अक्सर लोगों ने मन में कई सवाल होते हैं जैसे इसके रोगी दिमागी रूप से कमजोर होते हैं या इसका इलाज संभव नहीं है जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हर साल 17 नवंबर को नेशनल एपिलेप्सी डे मनाया जाता है। इस मौके पर न्यूरोफिजिशियन डॉ. केसी कावरे बता रहे हैं इससे जुड़े भ्रम और सच...

भ्रम : यह एक जेनेटिक बीमारी है।
सच :
मिर्गी के हर मामले का कारण आनुवांशिक हो, ऐसा जरूरी नहीं है। फैमिली हिस्ट्री के अलावा गंदे पानी में उगी सब्जियाें के जरिए पेट के कीड़ों के अंडे या तेज बुखार का दिमाग तक पहुंचना भी इसका कारण हो सकता है। इसके अलावा जन्म के समय दिमाग में ऑक्सीजन की कमी, अधूरी नींद, दिमागी बुखार, सिर की चोट या इन्फेक्शन भी इस बीमारी की वजह हो सकते हैं।

भ्रम : मिर्गी के पेशेंट मानसिक रूप से कमजोर होते हैं।
सच : मिर्गी के रोगियों को दिमागी रूप से कमजोर माना जाता है जो एक भ्रम है। मिर्गी की स्थिति दिमाग में मौजूद न्यूरॉन्स के अधिक सक्रिय होने पर बनती है। इसका असर कुछ समय के लिए जरूर रहता है। लेकिन इससे पेशेंट स्थायी रूप मानसिक कमजोर नहीं होता। दौरे के समय मरीज छटपटाता है, मुंह से झाग निकलता और हाथ-पैर अकड़ जाते हैं लेकिन ऐसा कुछ समय के लिए रहता है।

भ्रम : मिर्गी पेशेंट महिला को प्रेग्नेंसी में दिक्क्त होती है।
सच : मिर्गी के उपचार के लिए ली जाने वाली दवाओं का असर प्रजनन क्षमता पर नहीं पड़ता है। गर्भावस्था के दौरान भी ऐसी कई दवाएं हैं जिन्हें लिया जा सकता है।

भ्रम : इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है।
सच : मिर्गी का इलाज काफी हद तक संभव है। तकरीबन 80 फीसदी मरीज एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं से ही ठीक हो जाते हैं। गंभीर स्थिति में सर्जरी की जरूरत पड़ती है। ऐसे मरीजों को कुछ सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है जैसे देर रात तक न जागें, तले-भुने और तेज मिर्च वाले भोजन से परहेज करें, शराब न लें, अधिक ऊंचाई वाली जगह पर जाने से बचें।

भ्रम: दौरा पड़ने पर मरीज को पकड़ कर रखना चाहिए।
सच : यह सही नहीं है। मरीज को जबरदस्ती न पकड़ कर रखें। दौरा पड़ने पर मरीज के गर्दन के पास के कपड़े ढीले करें ताकि उसे सांस लेने में तकलीफ न हो। मरीज को कुछ भी न खिलाएं। ऐसी स्थिति में ज्यादतर लोग मरीज के मुंह में चाबी या चम्मच रखते हैं जो गलत है। उसे एक करवट की ओर लेटा दें।



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national epilepsy day 2018 myths and facts about epilepsy of mirgi

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टेक्सास की महिला को हुआ चार बार अलग-अलग तरह का कैंसर; हर बार लड़ीं, हर बार जीती


हेल्थ डेस्क. अमेरिका के टेक्सास की रहने वाली लॉरेन मार्लर एक ऐसी दुर्लभ बीमारी से जूझ रही हैं जो उन्हें चार बार अलग-अलग तरह का कैंसर दे चुकी है। बीमारी का नाम है कॉन्स्टीट्यूशनल मिसमैच रिपेयर डेफिशिएंसी और यह जीन से जुड़ी है। बीमारी के कारण जीन में ऐसे परिवर्तन आते है जो बचपन से ही रोगी में कैंसर का कारण बनते हैं। 28 साल के उम्र में लॉरेन अब तक 4 बार अलग-अलग तरह के कैंसर का सामना कर चुकी हैं।

15 साल की उम्र में हुई शुरुआत
इस अानुवांशिक बीमारी के कारण शरीर में जो बदलाव हुए उसका असर 15 साल की उम्र में दिखना शुरू हुआ।बॉथरूम में ब्लड आने के बाद लॉरेन काे गंभीर बीमारी का पहली बार अहसास हुआ। पेरेंट्स को बीमारी के बारे में बताने में असहज महसूस करने के कारण लॉरेन चुप रहींं लेकिन जब पेट का दर्द असहनीय हुआ तो मां को लेटर लिखकर पूरी बात बताई। जांच में सामने आया कि कोलोन में कैंसर की गांठ थी। कोलोन कैंसर के इलाज के लिए सर्जरी की गई और पेट में एक कृत्रिम आहार नाल को इम्लांट किया गया। हालांकि कीमोथैरेपी नहीं देनी पड़ी थी।

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19 साल की उम्र में दूसरा झटका
सर्जरी के बाद राहत मिलने से लॉरेन काफी खुश थीं लेकिन 9 माह बाद एक दोबारा कोलोन कैंसर डिटेक्ट हुआ। दोबारा इलाज के लिए पहले कीमोथैरेपी दी गई ताकि ट्यूमर का आकार कम किया जा सके। लॉरेन के मुताबिक सर्जरी के बाद की स्थिति काफी दर्द देने वाली थी। स्थिति सामान्य होने पर 20 साल उम्र में लॉरेन की शादी हुई लेकिन कुछ ही समय के बाद तलाक हो गया। नतीजा लॉरेन एक अपार्टमेंट में तनहा रहने लगीं।

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23 साल की उम्र में यूट्स कैंसर
करीब 23 की उम्र में कैंसर ने लॉरेन को तीसरी बार जकड़ा। इस बार यूट्रस कैंसर था। यह कार्सिनोमा कैंसर था जो कोशिकाओं में फैलता है। इलाज के दौरान डॉक्टर्स को लॉरेंस का यूट्रस और ओवरी को निकालना पड़ा। लॉरेंस के मुताबिक कैंसर इस हद तक मेरे जीवन को बदल देगा सोचा नहीं था। महीनों इलाज के बाद ऑस्ट्रेलिया के एक डॉक्टर ने इसकी वजह जानी और सामने आया कि लॉरेंस एक दुर्लभ बीमारी से जूझ रही हैं। जिसे कॉन्स्टीट्यूशनल मिसमैच रिपेयर डेफिशिएंसी बताया गया।

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2017 में लॉरेन की सेहत में सुधार आया और केटी मार्लर से शादी की।

चौथी बार लिम्फोमा का अटैक
रूटीन स्कैन के दौरान ही चौथी बार लॉरेन में लिम्फोमा (कैंसर का एक प्रकार) का पता चला। जो काफी गंभीर स्थिति में था और तत्काल इलाज के लिए ह्यूस्टन के एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर शिफ्ट किया गया। जहां करीब 6 माह तक रहीं और 6 तरह की कीमोथैरेपी की गई। इलाज के बाद 2017 में लॉरेन की सेहत में सुधार आया और केटी मार्लर नाम के शख्स से शादी की। लॉरेन कहती हैं कि मैं अब इस बीमारी से नफरत करती हूं और इसे हरा चुकी हूं।

क्या है बीमारी
कॉन्स्टीट्यूशनल मिसमैच रिपेयर डेफिशिएंसी ऐसी बीमारी है जब इंसान के जीन में नकारात्मक बदलाव होते हैं और यह कैंसर होने का कारण बनने लगता है। DNA में बदलाव आता है। ऐसी स्थिति में कोलोन, रेक्टम, यूट्रस, ब्रेन और ब्लड कैंसर होने का खतरा 16 गुना बढ़ जाता है। लॉरेन के मुताबिक जीन कैंसर में तब्दील हो चुका था। बीमारी को खत्म करना नामुमकिन था सिर्फ समय-समय पर जांच ही मेरे लिए बचाव का एक रास्ता था।



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Lauren beaten cancer four times suffering from rare genetic disorder
Lauren beaten cancer four times suffering from rare genetic disorder

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सप्ताह में एक घंटे वेट ट्रेनिंग वर्कआउट से हृदय रोगों का 70 फीसदी तक घट जाता है खतरा


हेल्थ डेस्क. सप्ताह में एक घंटे की वेट ट्रेनिंग करने से 70 फीसदी तक हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कम हो जाता है। अमेरिका की लोवा स्टेट यूनिवर्सिटी में हुई रिसर्च में मांसपेशियों पर गहरा असर डालने वाली एक्सरसाइज और हृदय रोगों के बीच एक कड़ी सामने आई है। 13 हजार लोगों पर हुए इस अध्ययन में सामने आया कि वर्कआउट के दौरान वजन उठाने से सीधा असर मांसपेशियों पर पड़ता है और ये मजबूत होती हैं। इससे मेटाबॉलिक सिंड्राेम होने का खतरा भी काफी हद तक घट जाता है। मेटाबॉलिक सिंड्राेम के तहत हाई ब्लड प्रेशर, हाई ब्लड शुगर, अतिरिक्त चर्बी के मामले आते हैं जो भविष्य में धमनियों में समस्या, स्ट्रोक और डायबिटीज का कारण बनते हैं।

5 मिनट से भी कम समय में होने वाले वर्कआउट का असर

रिसर्च से जुड़े डॉ. ली के अनुसार लोगों को जिम में वजन उठाने की ओर ध्यान देने की जरूरत है। बेंच प्रेस वर्कआउट के दो सेट भी काफी असर डालते हैं। जिसमें महज 5 मिनट का समय लगता है। अगर मसल्स को मजबूत बनाते हैं तोकैलोरी बर्न होने के साथ मोटापा घटता है।

बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने का रिस्क 32 फीसदी घटा

डॉ. ली के अनुसार जरूरी नहीं इसके लिए जिम ही जाया जाए। घर पर ही डम्बल के साथ की जाने वाली एक्सरसाइज भी हृदय रोगों से बचाती है। रिसर्च के दौरान लोगों को तीन ग्रुप में बांटा गया था। जिसमें सामने आया कि हफ्ते में 1 घंटे से कम एक्सरसाइज करने वालों में बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का रिस्क 32 फीसदी कम हो गया।



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Lifting weights for just an hour each week lowers the risk of heart attack

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29 साल की रेबेका को 12 दिन की उम्र से अब तक की सभी घटनाएं हैं याद


हेल्थ डेस्क.लोगों में जहां भूलने की समस्या आम होती जा रही है वहीं ऑस्ट्रेलिया की रेबेका की याद्दाश्त एक मिसाल है। हालांकि ये उनके लिए एक वरदान और अभिशाप दोनों ही है।29 वर्ष की रेबेका शेरॉक सुपर मेमोरी की बीमारी परेशान है। इनकी सबसे पुरानी याद्दाश्त उस दिन की है, जब महज 12 दिन की उम्र में उनकी तस्वीर ली गई थी। यही नहीं, उन्हें अपनी अब तक की जिंदगी का हर दिन, हर लम्हा, हर वाक्या बिल्कुल वैसे ही याद है,जैसे कल की बात हो। दरअसल, रेबेका 'हाईली सुपीरियर ऑटोबायोग्राफिकल मेमोरी' के साथ पैदा हुई थीं। मगर रेबेका के लिए ये खूबी वरदान के साथ-साथ अभिशाप भी है। रेबेका एक अत्यंत दुर्लभ बीमारी का शिकार हैं, जिसकी वजह है-न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर। इस कारण वे जिंदगी का कोई भी पल (अच्छा या बुरा) भूल ही नहीं सकती हैं।

पहला बर्थ-डे डरा देता है
रेबेका बताती हैं कि दिमाग में फ्लैशबैक चलता रहता है। सोने जाती हूं तो बहुत-सी यादें आ जाती हैं, जिससे नींद नहीं आती। पहले बर्थ-डे पर मिली मिनी माउस डॉल ने उसे डरा दिया था, ये भी याद आने लगता है। स्वाद और महक तक महसूस होती है।

थैरेपी का सहारा ले रही हैं
रेबेका पिछले कुछ सालों से थैरेपी की मदद ले रही हैं। उन लोगों से मिलती हैं जो उनके जैसी ही समस्या से परेशान हैं। वह बताती हैं कि ऐसी ही महिला से मैं मिलीं तो मुझे बहुत अच्छा लगा, क्योंकि वो मेरी परेशानी को ठीक तरह से समझ सकी।

बतौर मोटीवेशनल स्पीकर साझा कर रही हैं अनुभव
रेबेका शेरॉक मोटीवेशनल स्पीकर के रूप में काम कर रही हैं और वे अपने अनुभवों को लोगों से साझा करती हैं। उसे स्कूली दिनों की यादें ज्यादा खुश करती हैं।

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डिप्रेशन से बचने के लिए हैरी पॉटर नॉवेल पढ़ती हूं
रेबेका बताती हैं जब यादों का भूचाल सिर में खलबली मचाने लगता है तो उससे बचने के लिए हैरी पॉटर का नॉवेल पढ़ने लगती हूं। क्योंकि मैं इतनी सारी यादों से पीछा छुड़ाना चाहती हूं। इन यादों की वजह से 14 साल की उम्र में मैं डिप्रेशन का शिकार हो चुकी हूं।



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Rebecca Sharrock is suffering from highly superior autobiographical memory

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